(1)

दुनिया तो बाज़ार है ,

हम सब हैं सामान ।

उसका ही गल्ला यहॉं ,

उसकी ही दूकान ।।

(2)

करते हैं हम सब सदा ,

दुनिया तेरी वाह ।

कहते लेकिन सब यही ,

मोक्ष हमारी चाह ।। 

(3)

मेला है या स्वप्न है ,

समझ सका है कौन ।

दुनिया तेरे मर्म के ,

सभी अर्थ हैं मौन ।।

(4)

यहीं मिली ख़ुशियाँ हमें ,

यहीं मिली है पीर ।

इसीलिये तो भा रही ,

दुनिया की तासीर ।।

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'