प्रूफ रीडिंग के अनुभव
ऋषिकेश राजोरिया
नईदुनिया के संपादकीय विभाग की प्रूफ टेबल प्रकाशन सामग्री के यातायात में नाके की तरह थी। सभी खबरें, पत्र संपादक के नाम, कहानी, व्यंग्य, संपादकीय पेज की सामग्री, सबकुछ कंपोज होने के बाद इसी टेबल पर पहुंचती थी। शाम के समय करीब पांच से नौ दस बजे तक किशोर शर्मा रहते थे। उनकी गैर हाजिरी में दिन में प्रकाश जैन और रात में पवन गंगवाल, लक्ष्मीनारायण वर्मा प्रभारी रहते। सामग्री कंपोज होकर आने के बाद ये लोग तय करते थे कि कौन क्या पढ़ेगा। मैं प्रभात किरण में काम कर चुका था। नवभारत में काम कर चुका था। हालांकि वहां प्रूफ रीडिंग इस तरह नहीं होती थी। लेकिन मुझे खबरों के बारे में, अखबार में छपने वाली सामग्री के बारे में अच्छी खासी समझ थी। सभी जानते थे और सम्मान करते थे।
एक बार राहुल बारपुते का संपादकीय कंपोज होकर आया तो मैंने उसे देखने के लिए टेबल से उठा लिया। किशोर शर्मा वहां बैठे थे। उन्होंने कहा, वह बाबा के संपादकीय की गैली है, तुमने कैसे उठा ली? मैंने उनसे कहा कि हिंदी में ही कंपोज होकर आई है, किसी दूसरी भाषा में नहीं, मैं इसे पढ़ सकता हूं। मेरी बात से वह चिढ़ गए। मैंने उनके सामने ही एक साथी के साथ मिलकर उसे पढ़ दिया। गलतियों पर निशान लगा दिए। यह उन्हें अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं क्या कर सकता था? बाद में किशोर शर्मा ने मुझसे कुछ भी कहना बंद कर दिया। वे प्रूफ टेबल पर होने वाले कामकाज की रिपोर्ट महेन्द्र सेठिया को देते थे। कौन ठीक से काम नहीं कर रहा है, कौन तेजी से काम करता है, कौन गलतियां ज्यादा करता है, कौन समय का पाबंद है, कौन काम को लेकर गंभीर है, इस तरह की रिपोर्ट महेन्द्रजी के पास नियमित रूप से पहुंचती थी। ठीक काम करने वालों की गलत रिपोर्ट पहुंचने की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि संपादकीय विभाग में क्या चल रहा है, सभी, अभयजी, बाबा, महेन्द्र सेठिया, रनवीर सक्सेना, सभी डेस्कों के प्रभारी प्रत्यक्ष देखते रहते थे। वहां किसी तरह की कोई गोपनीयता नहीं होती थी। किशोर शर्मा नईदुनिया के पुराने आदमी थे और उन्हें कई पत्रकारों को नईदुनिया से बाहर करवाने का अनुभव था। राजेश बादल जैसे पत्रकार उनकी साजिशों के शिकार हो चुके थे। यह मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ।
प्रूफ रीडिंग की फुल प्रूफ व्यवस्था होने के बावजूद गलतियां हो ही जाती थी। जिनके लिए सजा मिलती। बहुत बड़ी गलती होने पर एकदम छुट्टी। सामान्य गलती होने पर एक दो दिन का निलंबन। और साथ में यह कि गलती करने वाले को खुद को लज्जित महसूस करना जरूरी था। मैं कुछ ही महीनों में उस प्रूफ टेबल का मजबूत स्तंभ बन गया। दोपहर बारह बजे से काम शुरू हो जाता था, जो रात दो बजे बाद तक चलता था। शाम को आठ बजे पहला संस्करण छपता। दिन की शिफ्ट वाले चले जाते। नाइट शिफ्ट वाले पहला संस्करण छपकर आने के बाद अपने अपने टिफन खोलते, ख्राना खाते। उसके बाद नगर संस्करण की खबरे आने लगती।
शशीन्द्र जलधारी नगर की खबरें संभालते थे। सिटी रिपोर्टर थे। मैं मौका निकालकर उनके पास पहुंच जाता, खबरें संपादित करने लगता। शहर भर की खबरें उनके पास आती थी। उनके पास दिलीप ठाकुर और माथुर साहब बैठते थे, जिनके साथ मैंने नवभारत में काम किया था और जो नवभारत छोड़कर नईदुनिया में आ गए थे। वे थ्री स्टार पेज के लिए खबरें बनाते थे और पेज लगवाते थे। उस पेज पर आम तौर पर देवास जिले की खबरें होती थी। थ्री स्टार संस्करण नगर संस्करण ही होता था, जिसका एक पेज बदल जाता था।
एक बार नगर संस्करण में एक खबर में विचित्र गलती छप गई। रालामंडल में वन विभाग के डिपो से लकडियों की नीलामी होने वाली थी। उसकी विज्ञप्ति नईदुनिया में पहुंची और खबर छपी कि रालामंडल में वन विभाग के डिपो से सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक लड़कियों की नीलामी होने वाली है। यह खबर छपने के बाद दफ्तर में कई फोन आए। शाम को प्रूफ टेबल पर हड़कंप मचा हुआ था। महेन्द्रजी को उनके नाम चाहिए थे, जिसने वह खबर कंपोज की, जिसने उसका प्रूफ पढ़ा, जिसने उसे पेज पर लगाया और जिसने पेज पढ़ा। इसमें किशोर शर्मा को अपनी भूमिका का मौका मिल गया। महेन्द्रजी ने प्रूफ पढ़ने वाले को छुट्टी पर भेजा, संबंधित उप संपादक को प्रूफ टेबल पर प्रूफ पढ़ने के लिए कहा और बाकी संबंधित लोगों को सबके सामने जमकर फटकार लगाई। नईदुनिया में एक गलती छपने पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया होती थी और गलती करने वाले को अच्छी खासी सजा भी मिलती थी।


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