हो चुका जड़ जो समय के घात से

आओ ऐसे प्यार को चेतन करें


बेवफ़ा शूलों की बातें भूल कर

फिर सुनायें प्रेम की सुरभित-कथा

अश्रुओं के आचमन की छाँव में

भूल जायें दाह की दग्दित-व्यथा

सार दुख का ख़ूब हम समझा चुके

आओ अब निस्सार को चेतन करें


ज़िन्दगी का देह से रिश्ता है क्या

प्राण को अब यह समझना चाहिये

नेह-पूरित देह की हर साँस हो

धड़कनों को भी महकना चाहिये

भूल बैठे फ़र्ज़ के पीछे जिसे

आओ उस अधिकार को चेतन करें


काव्य तो कितने रचे हमने मगर

प्रेम के तल तक कभी पहुँचे नहीं

शब्द के आकाश में उड़ते रहे

हम धरातल तक कभी पहुँचे नहीं

भाव का जो सुप्त सा संसार है

आओ इस संसार को चेतन करें


 लोकेश कुमार सिंह

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। Rajkaj.News की इन विचारों से सहमति अनिवार्य नहीं है। किंतु हम अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का आदर करते हैं।)