जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी से जुड़े 953 करोड़ रुपए के घोटाले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है।
इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस गोविंद माथुर की बेंच ने शेखावत की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है, लेकिन ये फैसला होना अभी बाकी है कि केस की जांच सीबीआई को साैंपी जाएगी या नहीं। भास्कर ने इसकी संभावनाओं की पड़ताल की तो सामने आया कि सीबीआई 2 साल पहले हाई कोर्ट में संजीवनी घोटाले की जांच करने की मांग को खारिज कर चुकी है।
दरअसल, 2020 में संजीवनी पीड़ित संघ ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें सीबीआई जांच की मांग की गई थी और केंद्रीय एजेंसी को पक्षकार बनाया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी किया, जिसका एजेंसी ने अप्रैल 2021 में 11 पेज में जवाब दिया।
इसमें सिलसिलेवार ढंग से बताया गया है कि संजीवनी घोटाले की जांच सीबीआई को क्यों नहीं मिलनी चाहिए? जवाब में यह भी बताया कि एसओजी अपना काम विधि सम्मत व सुचारू रूप से कर रहा है। जांच इतनी आगे बढ़ चुकी है कि सीबीआई को जांच सौंपने का औचित्य नहीं है।
हाई कोर्ट में सीबीआई की 3 आपत्तियां
1. मुकदमे दर्ज होने के बाद एसओजी जांच कर रही है। 5 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और चार्जशीट भी पेश कर दी है। मैट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट ने इस पर संज्ञान भी ले लिया है। बाकी आरोपियों के खिलाफ जांच लंबित है। ऐसे में सीबीआई से जांच करवाने का कोई औचित्य नहीं बनता है।
2. सीबीआई के पास सीमित संसाधन हैं। एजेंसी उन केसों में ही जांच करती है जो राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के होते हैं। सीबीआई के ऊपर प्रत्येक केस का अतिरिक्त भार डालना उचित नहीं है। खासतौर पर उस समय जब मौजूदा जांच एजेंसी अपना काम विधि सम्मत व सुचारू रूप से कर रही है।
3. याचिका में सीबीआई से जांच की मांग तो की है, लेकिन ये नहीं बताया कि एसओजी की जांच पर क्या आपत्तियां हैं, जिनकी वजह से केस को दूसरी एजेंसी को सौंपा जाए। यदि जांच गलत हो रही है तो सही जांच के लिए संबंधित न्यायालय में जाने का अधिकार कानून ने पहले से ही दे रखा है।


0 टिप्पणियाँ