पृथ्वी पर एक ऐसा तट है जहां मृत्यु महासागर की लहरों के रूप में मदमस्त्त हो कर विचरण करती है और आतताई भंवर रूपी महासागर की लहरों में खिलोने की तरह घूमता कोई दुर्भाग्यशाली समुद्री जहाज इन लहरों, अतितिव्र गर्जना करती हवाओं, चारों तरफ से घेरते कोहरे और सागर के पैंदे से उभरती चट्टानों के बीच में यदि फस जाता है तो शीघ्र ही वह टुकड़े टुकड़े हो निर्जन तट की तपती सफेद मिट्टी पर बिखरा हुआ नजर आता है। इस चक्रवूह में कुछ नहीं बचता, न वस्तु और न व्यक्ति। नामिब रेगिस्तान और अटलांटिक महासागर के बीच तपती सफेद मिट्टी की निर्जनता में जो दृश्य सामने आता है इसमें टूटे हुए पानी के जहाज, उनके लंगर, गनबोट, जीवनरक्षक कवच, नावें और मानव अस्थिपंजर आदि का बिखराव ही होता है।
प्राचीन पुर्तगाली सागरयात्री इसे नरक का तट कहते थे। सूरज की तपती किरणों से प्रताड़ित 500 किलोमीटर लंबे इस तट को आजकल स्केलेटन कोस्ट ( अस्थिपंजर तट ) कहा जाता है। इस तपते और अक्षमाशील सागर तट का परंतु अपना एक अप्रतिम सौंदर्य है। स्वीडन के खोजी और प्रकृतिविद चार्ल्स जॉन एंडरसन ने 1895 में इसके बारे में लिखा था कि भय की सीमा तक पहुंचती एक कंपकपी मेरे पूरे शरीर में फैल गई और मैंने माना कि इस जगह निर्वासन से तो मृत्यु कहीं बेहतर विकल्प है।
कोई सात लाख साल से तेज हवाओं और तपती बालू के प्रहारों से इस क्षैत्र की चट्टानों ने बहुत ही विस्मयकारी रूप ले रखे हैं। तट के दक्षिण में पर्वत श्रृंखला है जहां से बरसात के समय पानी के कई नाले निकलते हैं पर बालू इस पानी को अतिशीघ्र ही निगल लेती है पर कुछ नमी की वजह से घास और कुछ झाड़ियों के रूप में जीवन तो फूट ही पड़ता है। प्रकृति इस धरती के हर कोने में जीवन का रोपण कर ही देती है। इस रेगिस्तान में भी कुछ हिरण और हाथी रहते हैं। हाथी अपने मजबूत दांतों से मिट्टी खोदकर पानी का कोई ना कोई स्त्रोत ढूंढ ही लेता है और हिरण अपने खुर का उपयोग कर पानी तलाशते हैं। निरीह जीवों की जिजीविषा को देख किसी का भी दिल उद्वेलित हो सकता है।
स्केलेटन कोस्ट की हवाओं को नियमित जहाजी यात्रियों द्वारा सोंग्स ऑफ़ फ्यूनरल यानि अंतिम संस्कार का संगीत कहा जाता है। दिन में ये बहुत ही गर्म तथा तीव्र होती हैं परंतु रात्रिकाल में धीरे से हर तरफ गहरे कोहरे को फैला देती हैं। इस सन्नाटे से ढके तट पर शाम के धुंधलके के साथ ही रेगिस्तान के छोटे जीव जो दिन के समय अपने बिलों में घुसे हुए थे सागर तट पर प्रकट हो कर तीव्र गतिविधियां करने लगते हैं। ये जीव कोहरे की नमी को सोखने के लिए सारी रात बाहर रहते हैं क्योंकि यह नमी ही उनके लिए पानी को एकमात्र स्रोत है। यहां पर मेंढक रहता है जो अंधा ही जन्म लेता है और तट के ढेलों के नीचे छिपा रहता है। दिन की गर्मी के बढ़ते ज्योंहि झिंगुर, बीटल जैसे जीव इन ढेलों के नीचे शरण लेने आते हैं तो उनकी गंध के आधार पर यह मेंढक उनका शिकार कर अपना पेट भरता है।
यहां के बीटल की टांगे कैंचीनुमा होती हैं जो चलते समय खुल जाती हैं जिसके फलस्वरूप उसका शरीर तपती मिट्टी से ऊपर उठ जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो यह जीव 60 डिग्री सेल्सियस तपती बालू से भून जाता। यहां एक छिपकली भी रहती हैं जो एक बार में दो विपरीत पैरों को जमीन पर टिकाती है है और अन्य दो को हवा में रखती है ताकि पांव जल न जाएं। यह एक नर्तक की तरह उछल कर चलती है। समुद्र की लहरें इस तट पर कई तरह की मछलियों को ले आती है जिनका शिकार करने कई पक्षी सुबह के समय यहां आकर प्रतीक्षा करने लगते हैं। इस तरह से इस निर्जनता को ये जीव कुछ सजीव बना देते है।





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