पृथ्वी पर एक दौर था जब महामारियां चारों तरफ तबाही मचाती थी जैसे कि चेचक, हैजा, प्लेग, वायरल संचारित फ्लू और मेनिनजाइटिस आदि महामारियां। प्रथम विश्व युद्ध के आखिरी दौर 1918 में फ्लू महामारी, जिसे स्पेनिश फ्लू भी कहा जाता है, का जबरदस्त प्रकोप हुआ था जिसमें अंदाजा है कि कोई पांच करोड़ लोगों की मृत्यु हुई और पचास करोड़ लोग प्रभावित हुए। ध्यान रहे कि उस समय विश्व की आबादी करीब 200 करोड़ ही थी। तब से लेकर मार्च 2020 तक पृथ्वी के लोग भूल ही गए थे कि महामारी नाम की कोई चीज भी होती है पर महामारी तो होती ही है।

2019 के आखिरी महीनों के दौरान केंद्रीय चीन में कुछ न्यूमोनिया के मामले सामने आए जिनकी पुष्टि 7 जनवरी 2020 को सार्स कोव 2 नामक एक नए वायरस के रूप में हुई जो मार्च तक विश्व के तकरीबन हर भाग में पहुंच कर तबाही मचाने लगा था। हालांकि विश्वसनीय एवम् पूर्ण आंकड़ों की कमी रही पर करीब पांच करोड़ लोग कोविड 19 से पीड़ित रहे और 60 लाख से अधिक लोग मारे गए। त्वरित सूचना युग में हम महामारी को रोकने में सक्षम नहीं हुए हालांकि मृत्य दर और संक्रमण को तुलनात्मक तौर पर कम रखने में जरूर सफल रहे। पर महामारी के बाद इस दिशा में कोई भी गंभीर शोध नहीं हुआ कि कितनी मौतें गलत इलाज या कम इलाज के कारण हुई।

कोविड 19 का वायरस एक नया वायरस है जिसके बारे में पहले कुछ पता नहीं था पर यह कहां से आया इसके बारे में कुछ निश्चित पता नहीं चल पाया है। कुछ लोगों का यह दावा कि यह चीन की किसी प्रयोगशाला से निकला हुआ वायरस था मिथ्या धारणा पाया गया पर हो सकता है कि चीन में जिस तरह से जानवर खाए जाते हैं वहां से कोई जानवर का वायरस इंसान में प्रवेश कर सकता है। यह धारणा भी लेकिन सत्यापित नहीं हो पाई है।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट प्रोफेसर जोनाथन स्टॉय के अनुसार चीन को बिना सबूत के आरोपित करने का नुकसान यह हुआ कि चीन ने बहुत सी जानकारियां व्यापारिक नुकसान से बचने के प्रयास में छुपा ली, लोग चंद सप्ताह के लिए वायरस को भूल गए और वायरस ने विकराल रूप धारण कर लिया। प्रोफेसर स्टॉय के अनुसार ऐसी महामारियां फिर से आयेंगी तो हमें राजनीति और क्षैत्रीयता से बाहर हटकर सोचना होगा। इस महामारी में हमने कुछ ठीक किया पर बहुत कुछ गलत भी किया। हमें हमारे व्यवहार का आत्म विश्लेषण करना चाहिए ताकि भविष्य की तैयारी और बेहतर हो।

हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम पर्यावरण परिवर्तन के एक बड़े दौर से गुजर रहे हैं जिसमें कई जानी अनजानी विपत्तियां यकायक आ सकती हैं जो करोड़ों लोगों के जीवन को अस्तव्यस्त कर सकती हैं। जरा कल्पना कीजिए कि आज से 3 या 4 साल बाद सार्स 2 वायरस की जगह सार्स 3 आ जाए और उसके साथ एच आई वी का कोई बदला हुआ रूप भी आ जाए तो क्या हो सकता है ? टीकाकरण ने कई तरह की वायरस महामारियों को काबू में किया है। अभी जो कोविड के टीके उपलब्ध हैं उन पर अभी बहुत से लोगों का विश्वास नहीं है क्योंकि इन पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है, राजनीतिक द्वेषता विज्ञान पर हावी हो गई, पारदर्शिता की कमी आदि कितने ही कारण हैं जिन पर कोई वैज्ञानिक या जन संवाद नहीं हुआ है। कई लोग युवाओं में यकायक मृत्यु के लिए इन टीकों को जिम्मेदार मानते हैं हालांकि इस पर भी कोई विश्वसनीय अध्ययन नहीं हुआ है। इसके पहले किसी अन्य टीके का ऐसा राजनीतीकरण नहीं हुआ था।

हम सब एक त्रासदी से गुजरे हैं और सब ने कोई न कोई प्रिय खोया है। पर क्या हमारे आचार विचार में कोई परिवर्तन आया है ? क्या हमने कभी सोचा कि यह वायरस चीन की प्रयोगशाला की बजाय पर्यावरण प्रदूषण से प्रकट हुआ हो ? यदि निकट भविष्य में कोई ऐसी घटना फिर घटे तो क्या हम आर्थिक और शारीरिक मापदंडों पर उसका सामना करने में समर्थ हैं ? लगता है हमने महज इतना ही सीखा कि महामारी आ सकती है बाकी सारे सबक हमने स्वाहा कर दिए हैं पर याद रखिए महामारी किसी न किसी क्षण हम सब पर हमला करने की तैयारी में जुटी है। यदि हम हमारे पर्यावरण, जीवनशैली और भोजन की गुणवत्ता को नहीं संभालेंगे तो कोविड 19 से भी कहीं बड़ा उत्पात मूर्तरूप ले सकता है।