हमारे जीवन में हम वैज्ञानिकों की खोजों द्वारा प्रदत्त अनगिनत अन्वेषणों का उपयोग रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं। विज्ञान ने मनुष्य का अथाह ताकत दी है, सुविधाएं और सुरक्षा दी है बशर्ते विज्ञान का सही उपयोग हो। पर हम किसी समर्पित वैज्ञानिक को कोई खास सम्मान नहीं देते हैं। इसके विपरीत कोई लंगोटधारी, बाल बिखरे, दाढ़ी बढ़ाए आपके हाथ में राख प्रकट कर दे तो आप उसके आगे लंब लेट पड़ जाते हैं। आप तर्क नहीं तिकड़म के आगे समर्पण करने के आदि तो नहीं हो गए हो? मैं कई उच्च न्यायाधिपति, प्रोफेसर, डॉक्टर, वकील और बड़े नेताओं को जानता हूं जो दावा करते हैं कि उनके गुरु हवा में उड़ सकते है, एक समय कितनी ही जगह प्रकट हो सकते हैं। एक अति पढेलिखे, उच्च पदासीन महोदय का तो दावा था कि बांग्लादेश के युद्ध में अमेरिका के सातवें बेड़े को उनके गुरु जी ने अपनी भुजाओं के बल से घुमा दिया था जिसकी वजह से भारत पाकिस्तान को हरा पाया था !

ये बातें हंसने की नहीं हैं क्योंकि यह हमारे समाज के एक बड़ा वर्ग का वर्णन है। आपने आर्थिक मंदी के दौरान लोगों हो अपने टॉयलेट की दिशा परिवर्तित करते देखा होगा क्योंकि कई वास्तुकार मानते है कि मुंह घुमा नहीं कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था घूम जायेगी। माना इन वाहियात बातों का विरोध करते ही आप धर्म विरोधी वामपंथी उपद्रवी घोषित हो जाते हो पर विरोध होना चाहिए वरना समाज में वैज्ञानिक विचारधारा का विस्तार नहीं हो सकता और आने वाला समाज विज्ञान के अभाव में जीना संभव नहीं होगा।

विज्ञान का आधार जिज्ञासा और सवाल है। विज्ञान धर्म नहीं है जहां सवाल उठाते ही लोग थू थू करने लगें या फिर मार ही डालें। विज्ञान मानव निर्मित भगवानों जैसी भंगुर भी नहीं कि सवाल उठाते ही इस ईश्वर का अपमान हो जाए या उस ईश्वर का अस्तित्व तक खतरे में आ जाए। विज्ञान हर समय कुछ नया खोजती है। नए विचार, नए अन्वेषण और जो कुछ खोजा गया है उस पर भी सवाल उठा कर कुछ और बेहतर करने में प्रयासरत।

 जो कुछ भी किसी भी वैज्ञानिक ने कहा है उसे कसौटी पर सिद्ध करना होता है। महज दावे या ताल ठोकने से किसी की बात नहीं मानी जाती फिर चाहे कोई कितने भी बड़े पद पर आसीन क्यों न हो। यहां शब्दों के छलावों से काम नहीं चलता कि आंख बंद कर के विश्वास कर लिया जाए। इसीलिए विज्ञान सर्वदा परिवर्तनशील होता है क्यों कि श्रृष्टि भी समय के साथ परिवर्तित होती रहती है।

वैज्ञानिकों में भी संघर्ष और विरोध होता रहता है। इर्ष्या, प्रतिशोध आदि देखे जाते हैं पर आखिरी बात वो ही मानी जाती है जो कसौटी पर खरी उतरती है। इसीलिए आपसी प्रतिद्वंदिता के बावजूद वैज्ञानिक दंगा नहीं करते, ठेले और रिक्शा नहीं फूंकते, लोगों का मारते काटते नहीं क्योंकि विज्ञान में स्थापित तो वो ही बात होगी जो आंखों के सामने सत्यापित होगी। यहां अंध विश्वास को कोई जगह नहीं।

वैज्ञानिक बड़े तौर पर दो तरह के होते हैं। एक तो वो जो विज्ञान के ज्ञाता हो कर उसकी विधियों का उपयोग करने में प्रशिक्षित होते हैं। ये लोग बड़े से बड़ा वैज्ञानिक कार्य कर सकते हैं। एटम बम बना सकते हैं या फिर चांद पर यान भेज सकते हैं। ये प्रशिक्षित लोग हैं पर इनमें से काफी लोग अपने जीवन में वैज्ञानिक व्यवहार नहीं उतार सकते हैं। ये गैर वैज्ञानिक मानसिकता वाले वैज्ञानिक हैं जो बिल्ली के रास्ता काटने पर यात्रा स्थगित कर सकते हैं। रॉकेट छोड़ते समय टोटके करते हैं मानो टोटका ही सफलता का आधार है। ऐसे लोग विज्ञान में प्रशिक्षित लोग होते हैं जो अपनी शिक्षा एवम् प्रशिक्षण के बल पर विज्ञान का बड़े से बड़ा कार्य तो कर सकते हैं पर सोच में तर्क और विश्लेषण को नहीं उतार सके।

आज जब दुनियां में आठ अरब लोग हो गए हैं, भारत 200 करोड़ की तरफ बढ़ रहा है तो लोगों को अपना सोचने का दृष्टिकोण बदलना होगा वरना गलकटिया प्रतिस्पर्धा में पूरा जीवन एक सजा का रूप ले लेगा। अगले दस से बीस वर्ष में धरती पर बड़े परिवर्तन आ सकते हैं। जीवन में और लोगों के स्वभाव में जो परिवर्तन सैंकड़ों सालों में नहीं आए वे सब चंद वर्षों में आ सकते हैं क्योंकि पिछले तीन सालों में हम सब ने हमारे चारों तरफ इन परिवर्तनों की झलक देखी है। अब बेहतर जीवन जीने के लिए तर्क और विश्लेषण को जीवन में उतारना होगा और इसी सोच को वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहा जाता है। भय और टोटकों से भव सागर पार कर पाना अब संभव होता नजर नहीं आ रहा है क्योंकि

     सांस लेने को तो जीना नहीं कहते हैं 'जफर'

     जिंदगी थी जो  तिरे वस्ल का इमकान होता।

     ( तिरे - तेरे, वस्ल - मिलन, इमकान - संभावना )