इन लोगों को खामोशी के वातावरण में फुफकार, गूंज, भनभनाहट या सरसराहट जैसी आवाज लगातार
सुनाई देने लगती है। स्थाई टिनाइटिस ज्यादातर उन लोगों में होती है जो तेज आवाज के
माहौल में रहते हैं जैसे कि रॉक स्टार्स, अग्निशमन गाड़ी या एंबुलेंस के ड्राइवर, डी
जे, सेना के तोपखाने के जवान, बैंड बाजा के लोग आदि। इन में से 90 प्रतिशत लोगों की
श्रवण शक्ति में कुछ ना कुछ नुकसान पाया जाता है। तेज आवाज में मोबाइल सुनना एक नया
कारण होता जा रहा है। कान की सावधानीपूर्वक रक्षा ही एक पक्का इलाज है क्योंकि यदि
बीमारी हो गई तो डॉक्टर्स के पास आश्वासन के सिवा कुछ नहीं है।
कुछ लोगों में घबराहट या मानसिक तनाव की वजह से टिनाइटिस हो जाती पर यह विचार विमर्श
और विश्वास से सही हो जाती है। स्थाई रोग में कान के तंत्र या फिर मस्तिष्क के श्रवण
केंद्र में कोई गड़बड़ हो जाती है जिसे ठीक कर पाना अभी तक तो असंभव सा ही है। आपका
डॉक्टर आपकी हौसला अफजाई मात्र ही कर पाएगा। कुछ गिने चुने मामलों में शल्य चिकित्सा
या दवा राहत दे सकती हैं। कुछ अन्य मामलों में अवसाद के कारण पैदा हुए लक्षणों को भी
दवा से कम किया जा सकता है। एक्यूपंक्चर या योग इसमें कोई प्रभावकारी हो इसका कोई प्रमाण
नहीं मिला हालांकि दावा करनेवालों की बाढ़ आई हुई है। इन सब प्रयासों में धन खोने के
अलावा कुछ नहीं होता है।
टिनाइटिस के अधिकतर बुजुर्ग रोगियों की एक अन्य बड़ी त्रासदी यह है कि उनकी सामान्य
सुनने की क्षमता तो शून्य सी हो जाती है पर कान आवाजों से भर जाता है। इस व्यथा को
शब्दों में नहीं बताया जा सकता बस
घायल की गति घायल जाने, कि जिन लागी होय।
दरद की मारी बन बन डोलूं, वैद मिल्यो नहीं कोय।।
( मीरा )


1 टिप्पणियाँ
Excellent, Sir
जवाब देंहटाएं