दबाव क्षैत्र में अल्ट्रा वायलेट किरणों का तीव्र प्रवाह आणुविक बादलों की धूल को हटाने लगता है जिसके फलस्वरूप विशालकाय गोलाकार अंडे बनने लगते हैं। ये तारों के अंडे दबावयुक्त हाइड्रोजन के बने होते हैं और भविष्य के संभावित तारों के भ्रूण माने गए हैं। इन भ्रूणों में कुछ तो पूर्ण तारे में विकसित होते हैं पर कुछ मृतजात ( स्टिलबॉर्न) रह जाते हैं। अब यहां गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ने लगता है जिससे गैस बहुत ही गहन होने लगती है। ज्यों ज्यों घनत्व और तापमान में वृद्धि होती है पदार्थ और अधिक सघन होने लगता है। जब तापमान 15-20 मिलियन डिग्री सेल्सियस ( 1.5-2 करोड़ डिग्री ) हो जाता है तो हाइड्रोजन आपस में जुड़ कर हीलियम गैस बनती है जिससे थर्मोन्यूक्लियर प्रतिक्रिया होती है। इस प्रतिक्रिया में तारे के केंद्र से ऊर्जा बाहर निकलती है जिसके कारण वह ग्रेविटी ( घनत्व ) द्वारा पिचकने से बचा रहता है और करोड़ों वर्षों की जीवन यात्रा पूरी करता है क्योंकि लगातार ऊर्जा बाहर निकलने से ग्रेविटी कम होती जाती है और आणुविक फ्यूजन तीव्र होता जाता है। इन विरोधी क्रियाओं से ही एक तारा अपने ही वजन में दबने से बचा रहता है।
जो हीलियम जनित ऊर्जा एक तारे का वजूद बना कर रखती है वोही उसके नष्ट होने का कारण
भी बनती है। तारे का केंद्र एक अति विशाल भट्टी होता है जिससे अनंत ऊर्जा बाहर निकलती
रहती है। यदि यह तारा बड़ा है तो यह एक सुपरनोवा ( अधिनोवा ) बन कर फूट जाता है, अथाह
ऊर्जा बिखेर कर या तो किसी नए छोटे तारे को जन्म देता है या फिर बिखर जाता है। यदि
तारा अति विशाल है तो घनत्व के कारण सिकुड़ने लगता है जिससे उसके अंदर की ऊर्जा और
रोशनी बाहर नहीं आ पाती। ऐसे तारे को ब्लैक होल ( कृष्ण विवर ) कहते हैं। जो तारा छोटा
होता है उसके नष्ट होने की गति धीमी होती है क्योंकि उसमें घनत्व और आणुविक विघटन की
प्रक्रिया एक दूसरे को संतुलित किए रखती हैं।
कभी मृत तारा फूलने लगता है जिसे लाल दानव ( रेड डेविल) के नाम से पुकारा जाता है।
समय के साथ यह अपनी बाहरी गैस की परत को दूर फैंकता जाता है जिसे अस्थाई निहारिका कहते
हैं। आगे चलकर यह संकुचित हो जाता जाता है तब इसे "श्वेत बौना" ( व्हाइट
ड्वार्फ) कहा जाता है। ब्रह्मांड में ये हजारों की संख्या में नजर आते हैं।



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