थायराइड ग्रंथि हमारी गर्दन के सामने वाले भाग के तकरीबन मध्य में स्थित होती है पर यह सामान्यत न तो नजर आती है और ना ही अंगुलियों से महसूस की जा सकती है। यह ग्रंथि पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा नियंत्रित होती है जहां से टी एस एच नामक हार्मोन इसे टी 3 व टी 4 नामक तत्व बनाने को निर्देशित करता है। पिट्यूटरी ग्रंथि अपना कार्य मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस नामक क्षैत्र के दिशा निर्देश में करती है।  टी 4 चयापचय ( मेटाबॉलिज्म), मूड यानि मन भाव, शरीर के तापमान आदि को सामान्य बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होता है। थायराइड ग्रंथि टी 3 भी बनाती जोकि इसके अलावा अन्य स्थानों जैसे कि लिवर द्वारा टी 4 को परिवर्तित करके बनाया जाता है। टी 3 हमारे चयापचय ( मेटाबॉलिज्म), पाचन क्रिया तथा हड्डियों के स्वास्थ्य को व्यवस्थित करता है। यहां इस प्रक्रिया में यदि कोई बाधा पड़ जाए तो टी 3, 4 के रक्त स्तर गिरने लगते हैं और टी एस एच के बढ़ने। ऐसा होने पर चयापचय क्रिया धीमी पड़ जाती है, शरीर आलसी हो जाता है, उसका वजन बढ़ जाता है। प्रभावित व्यक्ति की आवाज मोटी हो जाती और त्वचा कुछ खुश्क और रूखी। ऐसा होने पर चिकित्सक रोगी को इस हार्मोन की बाहरी आपूर्ति की राय देते हैं जो कि आजकल ज्यादातर लोग यह मानने लगे हैं कि उन्हें जीवनपर्यंत लेनी पड़ेगी। पर क्या वास्तविकता ऐसी है ?

      हाइपोथाइरॉइड दो तरह का होता है। एक तो नैदानिक यानि क्लिनिकल और दूसरा संभावित नैदानिक या सबक्लिनिकल जिसमें टी 3 एवम् 4 तो सामान्य सीमाओं में होते हैं पर टी एस एच उच्च सीमा के पार चला जाता है। आजकल का चिकित्सा विज्ञान चूंकि सिर्फ जांचों पर आधारित हो गया है तो करोड़ों लोग इस सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म में ही थायरोक्सिन नामक दवा सुबह खाली पेट खा रहे हैं। मेयो क्लिनिक के एंडोक्रिनोलॉजी के विशेषज्ञों ने प्रसिद्ध जर्नल द लैंसेट में एक विस्तृत लेख लिखा है जिसके अनुसार पूरे विश्व में असंख्य लोग सिर्फ भय और दुविधा के कारण थायराइड की दवा खा रहे हैं। एक बार दवा शुरू होने पर कोई अनुभवी चिकित्सक उसे छुड़वाना भी चाहे तो रोगी गारंटी मांगता है, गारंटी कोई दे नहीं सकता और करोड़ों लोगों के दिन की शुरुआत इस दवा से होती है। मेयो क्लिनिक के अनुसार 60 प्रतिशत लोग शायद बिना आवश्यकता के ये दवा खा रहे हैं।

      जीवनपर्यंत दवा का पैसा, जांच का खर्च, चिकित्सक की फीस, परिवहन का खर्च आदि जोड़े जाए तो विश्व के स्तर पर अरबों रुपए बिना किसी फायदे के व्यय हो रहे हैं। इसके अलावा बीमार रहने की एक भावना हर समय बनी रहती है जोकि जीवन स्तर को प्रभावित करती है। एक और बात पर गौर करें तो जीवन भर दवा का उपयोग भी शरीर पर कुछ अनचाहे प्रभाव तो डालता ही है।

      दुनिया अंधी दौड़ दौड़ रही है, हर व्यक्ति व्यस्त है पर कोई नहीं समझा सकता कि ऐसा क्यों है। व्यस्त चिकित्सक उदासीनता से कहता है कि दवा खाते रहो। लोग इतने व्यस्त हो गए हैं कि शरीर के बारे में आराम से बैठ कर सोचने का समय नहीं निकाल पाते हैं। चूंकि 60 प्रतिशत तथाकथित रोगी ठीक हो चुके होते हैं क्योंकि जब भी स्थितियां सामान्य होती हैं टी एस एच के स्तर कुछ माह में स्वतः सामान्य हो जाते हैं। ऐसे में कुछ चतुर लोग रिसर्च व एविडेंस बेस्ड के नाम पर अपनी दवाओं की मदद से जो है ही नहीं उस रोग को जड़ से निकाल कर करोड़ों लोगों को स्वस्थ करने का दावा करके मालामाल हो रहे होते हैं। अधूरे ज्ञान का अपना खुद का एक समानांतर चक्र है जो चलता रहता है, चलता रहेगा।