श्रीगंगानगर - राकेश मितवा
श्रीगंगानगर। बीकानेर से आए वरिष्ठ शायर क़ासिम बीकानेरी का कहना है कि शायर, कवि या साहित्यकार हिंदू या मुसलमान नहीं होता। वह सिर्फ इंसान होता है और इंसानियत की बात करता है। वह किसी भी धर्म या जात से ऊपर होता है। वह जहां कहीं भी कोई विद्रूपता देखता है, उसे इंगित करके अपना विरोध दर्ज करवाता है।
यही ईमानदारी उसे साहित्यकार बनाए रखती है।
क़ासिम रविवार को सृजन सेवा संस्थान के यहां जवाहरनगर स्थित महाराजा अग्रसेन विद्या मंदिर सैकेंडरी स्कूल में आयोजित मासिक कार्यक्रम ‘लेखक से मिलिए’ में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि शायरी में उस्ताद का होना भी बहुत जरूरी है। जब तक हम उस्ताद से इस्लाह नहीं लेते, तब तक हम इसकी बारीकियों को नहीं समझ पाते।
कार्यक्रम में क़ासिम ने अलग-अलग मिज़ाज़ की शायरी प्रस्तुत करके श्रोताओं की खूब प्रशंसा बटोरी। देशभक्ति और कौमी एकता को केंद्र में रखते हुए उन्होंने अपनी ग़ज़ल कही-मेरा ये दिल है और यही मेरी आन लिख देना, कफ़न के हर सिर पर मेरे हिंदुस्तान लिख देना, हमें काशी से उल्फत है, हमें काबे से निस्बत है, सभी पर है निछावर ये हमारी जान लिख देना। क़ासिम ने अपने चार सौ चार अशआरों वाली एक ग़ज़ल के कुछ शे’र भी अर्ज किए। उन्होंने मौजूदा हालात को इंगित करते हुए कहा-एक पल में उजाड़ दी बस्ती, एक सदी लगती है बसाने में।
कार्यक्रम के दौरान भूपेंद्रसिंह, मीनाक्षी आहुजा एवं ऋतुसिंह ने उनसे कुछ सवाल किए, जिनका उन्होंने बड़ी सहजता से जवाब दिया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि लॉयन्स क्लब सेंटर के अध्यक्ष परविंदर लूणा ने कहा कि साहित्यकार जवानी में जो लिखता है, वह बुजुर्गों जैसी बात करता है। यह लेखन उसे विशिष्ट बनाता है। कार्यक्रम के अध्यक्ष पुरोहित ब्लड बैंक के अध्यक्ष विष्णु पुरोहित ने इस तरह के कार्यक्रमों के लिए शुभकामनाएं दीं।
इस मौके पर क़ासिम बीकानेरी को सृजन सम्मान प्रदान किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष पुरोहित, विशिष्ट अतिथि लूणा, सृजन के संरक्षक विजय गोयल, अध्यक्ष डॉ. अरुण शहैरिया ताइर एवं संयोजक डॉ. संदेश त्यागी ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर, सम्मान प्रतीक व साहित्य भेंट करके सम्मानित किया।
इस मौके पर सृजन को राज्य सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संस्कृति संवर्धन सम्मान प्राप्त होने पर केक काटकर खुशी मनाई गई। कार्यक्रम में ममता आहुजा, सुषमा गुप्ता, सुशीला कुमारी, अरुण खामख्वाह, बीएस चौहान, योगराज भाटिया, सुरेश कनवाडिय़ा, डॉ. आशाराम भार्गव, कैलाश दिनोदिया, डॉ. ओपी वैश्य, आशीष अरोड़ा, रमेश कुक्कड़, अमित चराया, कृष्णकुमार आशु, कृष्ण वृहस्पति, बालकृष्ण लावा, राजकुमार सिंगल, ऋषभ पैंसिया, बन्नी गंगानगरी, विजयकृष्ण कौशिक, नरेंद्र भठेजा व गौरव गुप्ता सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं साहित्य प्रेमी मौजूद थे।