यदि किसी व्यक्ति के दिल में सीखने की ललक हो जोकि जीवनपर्तन्त बने रहे , चतुराई एवम् नियमितता से कार्य करने के क्षमता हो, जिसके विचार दृढ़ और विज्ञान आधारित हों तो फिर उम्र किसी सी उम्र में बाधा नहीं बनती है। मेरे निकट के रिश्ते में एक युवक ने प्लांट मॉलिक्युलर बायोलॉजी में उच्च अध्ययन किया, फिर उसी विषय में डॉक्टरेट किया, अमेरिका में कार्य किया, स्वीडन में आमंत्रित किया गया, नागरिकता प्रदान की गई जहां वह एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक के रूप में जाना गया। एक दिन उसने डॉक्टर बनने के बारे में विचार किया और वह भी स्वीडिश भाषा के माध्यम से। स्वीडिश भाषा को सीखना आसान लगता है पर उस पर महारथ हासिल करना आसान नहीं है पर एक डॉक्टर के लिए स्थानीय भाषा का पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। उस युवक ने उस भाषा पर महारथ हासिल किया और कोई 41 वर्ष की उम्र में वह प्लांट बायोलॉजिस्ट से डॉक्टर बनने में कामयाब हुआ। यह मानवीय दृढ़ संकल्प के अनगिनत उदाहरणों में से एक है।

     देखा गया कि चाहे कोई नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक हो, वैज्ञानिक हो, ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता हो, राजनीति का माहिर हो सब की मानसिक स्थिति का यदि निकट से अध्ययन किया जाए तो एक बात सामने आती है कि उन सब में अपने लक्ष्य को पाने की लगन और दृढ़ता थी, बार बार की असफलता से ऐसे लोग अपने उद्वेश्य से भटकते नहीं हैं। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास प्रचूर मात्रा में होता है। एक और बात समझ में आती है कि कोई भी व्यक्ति प्रतिभा लेकर जन्म नही लेता है। जन्मजात प्रतिभा एक भ्रम और छलावा है। बचपन से ही किसी प्रोत्साहन की वजह से कुछ बच्चे आत्म प्रेरित हो जाते हैं जिसके कारण वे आगे बढ़ जाते हैं। मेरे मानना है कि हर व्यक्ति अद्वतीय होने की क्षमता से सुसज्जित है बात बस इस तथ्य को जानने की है। सफलता पाने में शिक्षा बड़ी सहायक होती है पर बिना शिक्षा के भी काफी लोग सफलता के नए आयाम खड़े कर सकते हैं इसलिए यदि आपने उच्चशिक्षा न पाई हो तो भी हीन भावना में जाने की जरूरत नहीं है। मेहनत और लगन आपको किसी भी ऊंचाई तक ले जा सकती है।

     आज के इस शहरीकरण में लोग अब लोग नही रहे, वे व्यक्ति बन गए हैं, संख्या का हिस्सा मात्र रह गए हैं। जीवन में रस और रंग लाने के लिए आपको फिर से लोग बनना होगा। व्यक्ति और लोग में फर्क होता है। व्यक्ति महज एक इकाई है, गणित की संख्या है, लोग एक संस्कृति है, अस्तित्व है, एक योग है, जुड़ाव है। किसी कवि के लहजे में कहूं तो ;

     सब में सब की आत्मा, सब में सब का योग

     ऐसे भी थे दिन कभी, ऐसे भी थे लोग ।।

     जिस दिन आपने यह जान लिया , जान कर ठान लिया कि जो कुछ कोई और मनुष्य कर सकता है वह मैं भी करने की क्षमता रखता हूं तो बस कितने ही रास्ते खुल जायेंगे और जिंदगी कह उठेगी

     हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है

     जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।

     ( बशीर बद्र)

     कितने ही लेखक हैं जिन्होंने 60 साल के बाद लिखना प्रारंभ किया, वैज्ञानिकों ने नए अन्वेषण किए, विद्वानों ने समाज को नई दिशा दी। उम्र एक गणित है और लगन एक तरह का हीरा। बस तरासते रहिए, जीवन चमक उठेगा। यदि ऐसा नहीं किया तो मन की उदासी इस भूभाग की उदासी के साथ मिलकर गाढ़ी हो जायेगी।

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