चित्तौडग़ढ़-गोपाल चतुर्वेदी।
चित्तौडग़ढ़ के विश्व प्रसिद्ध दुर्ग के विजय स्तंभ की गोद में तथा जोहर स्थली के पास व गौमुख कुंड के ऊपर प्राचीन समिधेश्वर महादेव मंदिर में जो प्रतिमा है वह देश की सबसे बड़ी प्रतिमा है. जिसमे ब्रह्मा,विष्णु और महेश त्रिमूर्ति का समावेश है। दुर्ग पर आने वाले देसी व विदेशी पर्यटक इस मूर्ति को देख कर दांतो तले उंगली दबा देते हैं। चित्तौड़गढ़ के विश्व प्रसिद्ध दुर्ग के विजय स्तंभ व जौहर स्थल के पास तथा गौमुख कुंड के ऊपर प्राचीन समिधेश्वर महादेव मंदिर को 11वीं शताब्दी में परमार राजा भोज जो कि मध्य प्रदेश के भोपाल के रहने वाले थे उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया था।
वहीं वास्तु शास्त्र के हिसाब से यह मंदिर अद्भुत बनाया गया है। इस मंदिर की नीव कमल के फूल के ऊपर रखी गई है तो वहीं उसके ऊपर कीचक बनाए गए हैं. उसके ऊपर हाथी तथा उस पर अप्सराओं और देवियों की छवि बनाई गई है। वही मंदिर में काला पत्थर लगाया गया है। जिससे कि किसी की नजर ना लगे। समिधेश्वर महादेव मंदिर की विशेष बात है कि मंदिर के बाहर बैठे नंदी की आंखें प्रतिमा की आंखों से मिलती है।ऐसा माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मनोकामना इस नंदी की कान में कहता है तो उसकी मनोकामना पूरी होती है।
वही पूरे भारत में 9 फीट बड़ी ऐसी विशालकाय प्रतिमा नहीं है। इस प्रतिमा में ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों की कृति समाहित है. जहां ब्रह्मा के हाथ में कमल है, तो विष्णु के हाथ में शंख,वही महादेव के हाथ में खप्पर है। यहां आने वाले श्रद्धालु बीच वाले मूर्ति को महादेव की मूर्ति समझते हैं,लेकिन वह विष्णु की मूर्ति है। ऐसा कहा जाता हैं कि इस विशालकाय मूर्ति का अभिषेक विधि विधान से किया जाए तो सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस मूर्ति का इतिहास मंदिर में लगे शिलालेखों पर लिखा है। राजा महाराजा जब भी युद्ध में जाते थे इस मंदिर में दर्शन करने के पश्चात ही वह युद्ध के लिए रवाना होते थे। रानियां व दास, दासिया जौहर करने से पहले इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद अपने आप को अग्नि में समर्पित करती थी।

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