ज़िन्दगी हो गयी है वो लकड़ी

है चमक जिसमें किन्तु दीमक है


लोग कहते हैं क्या ग़ज़ब हो तुम

किन्तु मैं जानता हूँ मैं क्या हूँ

जो है भीतर से खोखला पूरा

मैं उसी पेड़ के तने सा हूँ

है ग़नीमत कि हूँ खड़ा अब तक

और बाक़ी अभी ये धक-धक है


ज़ीस्त मेरी है उस जुआरी सी

रोज़ ही दाँव जो लगाता है

रोज़ जो खेलता नयी बाज़ी

और फिर रोज़ हार जाता है

हाँ मगर ये जुए का शौक़ मेरा

लोग कहते हैं कुछ भयानक है


अपने दर्पण के फ़्रेम कितने ही

मुझसे हरदम बनाये लोगों ने

कैसी नक्काशियाँ भी कीं उन पर

ख़ुद के चेहरे सजाये लोगों ने

मैं भी तो चाहता रहा पॉलिश

फल सदा चाहता ज्यों साधक है


अब तो बस है यही तमन्ना इक

काम ख़ुद के भी थोड़ा आ जाऊँ

ख़ुद ही बन जाऊँ अपनी अर्थी मैं

ख़ुद ही अपनी चिता को भा जाऊँ

और हो जाऊँ अपनी नज़रों में

ऐसा दाता जो ख़ुद ही याचक है

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'