(1)

कामनाओं के प्रखर को देख कर

भाव के उमड़े भँवर को देख कर

खिल गये कलियों के मन में फूल से

झूमते-गाते भ्रमर को देख कर

(2)

नैन ने फिर मोद का अंजन लिया

नेह ने फिर देह का वन्दन लिया

हट गये फिर लाज के सब आवरण

जब भ्रमर ने फूल का चुम्बन लिया

(3)

देह के अनुराग में कुछ भी नहीं

बेसबब से त्याग में कुछ भी नहीं

जानते हैं फूल भी इस बात को

बिन भ्रमर के राग में कुछ भी नहीं

(4)

इक कलंकित सा कथन होने लगे

भोग का ही आचमन होने लगे

अब नहीं होते भ्रमर ही मनचले

फूल भी अब बदचलन होने लगे

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'