सीए सी.एल. यादव

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, अंत: परिवर्तन नितांत ज़रूरी है।सकारात्मक  परिवर्तन एक प्रगतिशील समाज व सुदृढ़ व्यवस्था के लिए वरदान साबित होते हैं ।

लेकिन यह भी आवश्यक नहीं है कि सारे परिवर्तन समाज व व्यवस्था के लिए वरदान ही हो, समय, काल व परिस्थितियों के अनुसार व पारदर्शी नीतियों के अभाव में परिवर्तन अभिशाप भी बन जाते है।

परिवर्तन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, भौगोलिक किसी भी प्रकार के हो सकते हैं । लेकिन हर परिवर्तन के अपने मायने होते है। सकारात्मक व नकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव अवश्यम्भावी है।

मानव हर परिवर्तन सकारात्मक परिणामों की चाहत में ही स्वीकार करता है । ऐसा भी होता है कि कई बार परिवर्तन के परिणाम का प्रभाव व मायने समय, काल, परिस्थितियों, सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना व स्थान के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं ।

21वी सदी के बदलावों के मायने, हो सकता पुर्व की सदियों से अलग हो सकते हैं लेकिन हर परिवर्तन के समसामयिक, आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक प्रभाव ज़रूर होते है। 

किसी भी देश में राजनीतिक व आर्थिक बदलाव भी एक सत्तत प्रक्रिया है। हर उन्नतिशील समाज में निरन्तर सत्तत, सुदृढ़ व सर्वांगीण सामाजिक व आर्थिक विकास, बदलाव अतिआवश्यक है।

1991 में लागू की गई आर्थिक उदारीकरण की नीति भी एक बड़ा परिवर्तन था जिसके कारण देश व समाज सत्तत आर्थिक विकास के पथ पर तेज़ी से अग्रसर हो रहा था। इसी का परिणाम था कि तमाम झंझावतो के  बावजूद देश की अर्थव्यवस्था निरन्तर फल फूल रही थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले युपीए शासनकाल के दौरान तो हर भारतीय नागरिक समृद्ध बना रहा था, आर्थिक विकास के नये आयाम स्थापित कर रहा था । लेकिन इसी दौर में देश में नई बयार चली, तथ्यहीन सुचनाओ के आधार पर स्थापित सरकार को बदनाम करने की, अन्ततः मंसूबे पूरे हुये, परिवर्तन की हूंक उठी, 2014 में सरकार बदली, नये बदलाव का दौर शुरू हुआ व  परिणाम भी देश के सामने है।

इसी को संदर्भित कर कुछ आँकड़े, जो चौंकाते भी है तो हो सकता है कुछ अलग सन्देश भी देते हैं, इस पर पाठको के मंतव्य अलग हो सकते हैं ।

साल 2014 को भारत के राजनीतिक इतिहास में बड़ा क्रान्तिकारी परिवर्तन का साल माना जाता है। क़रीब 25 वर्ष पश्चात एक पुर्ण बहुमत वाली सरकार देश को मिली, जो भ्रष्टाचार मुक्त, सुदृढ़ व सत्तत आर्थिक व सामाजिक विकास, सबका साथ सबका विकास की बात करके सत्ता पर क़ाबिज़ हुई ।

2014 में जब देश राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक चेतना का नया अध्याय लिख रहा था, जैसा कि प्रचारित प्रसारित किया जाता रहा है, उस समय देश पर कुल (बजट डॉक्यूमेंटस् के अनुसार) ₹56,70,181.01 करोड़ की उधारी, ऋण व देनदारियाँ थी जिसमें से विदेशी ऋणरा़शी  ₹184580/- करोड़ के क़रीब के थी, वही यह उधारी व ऋण की राशि, सिर्फ़ 7 सालो में ही दोगुनी से भी ज़्यादा बढ़कर 31 मार्च 2021 को समाप्त वित्त वर्ष में ₹12122467/- करोड़ की हो गई । जिसमें विदेशी ऋणराशी ( एक्सटरनल डेब्टस्) ₹382829/- करोड़ की हो गई ।वहीं इसके विपरीत देश के सकल घरेलू उत्पाद की बढ़ने की दर लगातार घट रही है, बेरोज़गारी अपने ऐतिहासिक शीर्ष पर है, व्यापार घाटा व राजकोषीय घाटा निरन्तर बढ़ता जा रहा है । सकल घरेलू उत्पाद का कुल वार्षिक आकार 2 ट्रीलियन डॉलर से कम हो गया।

तो क्या देश वास्तव में मज़बूत हाथों में सत्तत विकास कर रहा है? 

कहीं देश आर्थिक कुप्रबन्धन की वजह से बुरी तरह क़र्ज़ में तो नहीं डूब चुका है? 

यह क़र्ज़ में भारी भरकम बढ़ोतरी उस समय काल में हो रही है जब सरकार, देश के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को एक-एक करके बेचने पर उतारू है। हवाई अड्डे, पोर्ट, रेलवे स्टेशन, रेलगाड़ियाँ, एलआईसी, एयरलाइंस, बैंक एक एक कर बेची जा रही है । रिज़र्व बैंक का इमरजेंसी फ़ण्ड निकाला जा रहा है व सोना बेचा जा रहा है, विकास के नाम पर आम जनता से पेट्रोल व डीज़ल पर भारी भरकम टेक्स वसूला जा रहा है, वहीं  दूसरी ओर पूँजीपतियों को बड़ी कर राहत व अनुदान दिये जा रहे हैं । 

राज्यों को मिलने वाले केंद्रीय करो में हिस्सेदारी में भी निरन्तर कटौती की जा रही है व केन्द्रीय परियोजनाओं में केंद्रीय अंशदान को लगातार कम किया जा रहा है व राज्य सरकारों पर अनावश्यक आर्थिक भार डाला जा रहा है।

इतना ही नहीं, जो सरकार ऑयल बाँण्डस के जारी किये जाने के लिए पूर्ववर्ती सरकारों अर्थात् वाजपेयी व मनमोहन सिंह सरकार को दिन रात कोसती रहती है, व 7 सालो मे सिर्फ़ ₹ 3500 करोड़ के ऑयल बाँण्डस् के पुनर्भुगतान के नाम पर लाखों करोड़ रुपये का कर वसूल करने वाली मज़बूत व ईमानदार सरकार ने ही पिछले 4-5सालो में ही क़रीब ₹ 286348/- करोड़ रुपये के ‘बैंक बाँण्डस्’ बैंकों के सुदृढ़ीकरण के नाम पर जारी कर दिए गये। इन बैंक बाँण्डस से बैंकों का कितना सुदृढ़ीकरण हुआ, साफ़ सुथरी बैलेंसशीट के नाम पर कितने ऋण, बट्टे खाते डाले गये, वो अलग बात है, जिसको सब जानते ही हैं !!

यदि क़रीब ₹134000 करोड़ रुपये के ऑयल बाँण्डस में से सिर्फ़ ₹3500 करोड़ के बाँण्डस के पुनर्भुगतान के नाम पर, यदि लाखों करोड़ का पेट्रोल-डीज़ल पर कर का अनावश्यक बोझ देश  के आमजन पर डाला जा सकता हैं तो फिर आगामी वर्षों में किये जाने वाले ‘बैंक बाँण्डस’ के पुनर्भुगतान का भार क्या सरकारी बैंकों के सम्मानित ग्राहकों व जमाकर्ताओं को वहन करना होगा व यह क़ीमत खुन पशीने की मेहनत से पाई पाई जोड़कर जमा की गई राशि से वसूल होगी ?

आज देश का व्यापार घाटा व आयात निरन्तर बढ़ रहा है, मैक इन इंडिया, स्किल इंडिया धरातल पर फलीभूत होते नज़र नहीं आ रहें हैं । महंगाई अनियंत्रित हो रही है, व आमजन महंगाई से बुरी तरह से त्रस्त हैं, उधारी व ऋण लगातार बढ़ रहे हैं व जीडीपी का वास्तविक आकार लगातार सिकुड़ रहा हैं, तो क्या ये सब हालात कहीं आर्थिक अकुशलता को तो इंगित नहीं कर रहे है?

क्या देश कहीं आर्थिक कुप्रबन्धन के भंवर में तो नहीं फँस गया ?

क्या देश बदलाव  की क़ीमत चुका रहा है ?