उदयपुर भगवान प्रजापत।
मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने जैन धर्म (श्वेतांबर तेरापंथ) के शांतिदूत आचार्य महाश्रमण से भीलवाड़ा में मुलाकात कर शुभाशीष लिए। खास बात यह है कि मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने आचार्य महाश्रमण के सम्मान में उनके सम्मुख कुर्सी पर नहीं बैठकर आचार्य श्री के श्रीचरणों में बैठकर आशीर्वाद लिया। लक्ष्यराज आचार्य श्री के पूज्यचरणों में इस प्रकार बैठे मानो उनका कोई अनन्य शिष्य श्रीचरणों में बैठा हो। लक्ष्यराज सिंह ने इस अवसर पर कहा कि जिन्होंने शस्त्र उठाएं हैं वे वीर हैं और जिन्होंने शस्त्र त्यागे हैं वे महावीर हैं। देश की अस्मिता की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने वाले वीरों का हम सबके ह्रदय में सम्मान है और जिन्होंने शस्त्र त्यागे हैं या रखवा दिए हैं उन महावीर के प्रति हमारे ह्रदय में अटूट मान-सम्मान है। मेवाड़वासियों के लिए सौभाग्य की बात है कि सर्वाधिक जैन मंदिर मेवाड़ में हैं, क्योंकि सर्वधर्म के लिए सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र मेवाड़ ही रहा है। जैन धर्म के अनुयाइयों ने वीर भूमि मेवाड़ में जो आस्था और विश्वास की अलख जगाई वह गौरव की बात है। आज भी रणकपुर के जैन मंदिर और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का इस दुनिया में कोई सानी नहीं है। मुझे जैन धर्म के अनुयाइयों ने आचार्य महाश्रमण के शुभाशीष दिलाने के लिए आमंत्रित किया उनका आभार व्यक्त करता हूं। 

आचार्यश्री ने बताया कि चतुर्मास का महत्व।
आचार्यश्री ने कहा कि आदमी को अपनी आत्मा के हित के लिए बहुश्रुत की पर्युपासना, साधना करना व उनसे जिज्ञासा करनी चाहिए। चारित्रात्माओं के लिए ही नहीं, श्रावक-श्राविकाओं के लिए भी चतुर्मास का समय ज्ञानाराधना की दृष्टि से उपयोगी है। इस दौरान चारित्रात्माओं को अनेकानेक ग्रन्थों, आगमों के स्वाध्याय का अच्छा अवसर मिलता है तो श्रावक-श्राविकाओं को चारित्रात्माओं के दर्शन, सेवा व उपासना के माध्यम से ज्ञान प्राप्त हो सकता है।