श्रीगंगानगर राकेश मितवा।
साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं सृजन सेवा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में ‘राजस्थानी साहित्य में गांधी’ विषयक एक दिवसीय परिसंवाद  राजकीय सार्वजनिक जिला पुस्तकालय में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ जिलों के साहित्यकारों के साथ बीकानेर एवं जोधपुर से भी साहित्यकार शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मंगत बादल ने कहा कि राजनेताओं के लिए तो गांधी की प्रासंगिकता सदैव रही ही है। लेकिन गांधी आम आदमी के लिए भी बहुत प्रासंगिक हैं। जिस राज का कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, उस राज को भी गांधी ने झुकने के लिए मजबूर कर दिया। बादल ने माना कि बेशक अन्य क्रांतिकारियों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी। उनका भी अपना योगदान था लेकिन वे क्रांतिकारी भी गांधी के महत्व को समझते थे और मानते थे।बीज वक्तव्य देते हुए साहित्य अकादेमी के राजस्थानी परामर्श मंडल संयोजक मधु आचार्य आशावादी ने कहा कि देश में पिछले एक दशक से जो हालात बने हैं। उन्हें देखते हुए गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि लोगों ने गांधी को पढ़ा तो है लेकिन उनके जीवनदर्शन का उपयोग नहीं किया। दरअसल गांधी जीवनदर्शन का विषय है।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सृजन सेवा संस्थान के संरक्षक विजयकुमार गोयल ने कहा कि जो दूसरों के लिए कार्य करता है, वही महान बनता है। उन्होंने कहा कि गांधीजी सच के रास्ते पर चले और अगर उन्होंने गलती की तो उसे स्वीकारने में भी पीछे नहीं हटे। आज ऐसा नहीं हो रहा है।इससे पहले संगीत की प्रोफेसर डॉ. अंजू बोरड़ ने राजस्थानी में गणेश वंदना प्रस्तुत की। स्वागत वक्तव्य में साहित्य अकादेमी के सहायक सम्पादक ज्योतिकृष्ण वर्मा ने गांधी जी के जीवन पर प्रकाश डाला और कार्यक्रम की रूपरेखा बताई। उद्घाटन सत्र का संचालन जिला पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. रामनारायण शर्मा ने किया।प्रथम सत्र में ‘राजस्थानी साहित्य में गांधी जी का सत्याग्रह आंदोलन’ विषय पर पत्रवाचन करते हुए जोधपुर से आई संतोष चौधरी ने कहा कि सत्याग्रह का मूल लक्ष्य है अन्याय, अत्याचार का शांतिपूर्वक तरीके से विरोध करना। उन्होंने कहा कि गांधी जी ने सत्याग्रह के माध्यम से आत्मबल का परिचय दिया। संतोष चौधरी ने अनेक कवियों व साहित्यकारों का उदाहरण देकर बताया कि राजस्थानी साहित्य में गद्य और पद्य दोनों में ऐसी रचनाएं मिलती हैं, जो गांधी जी के सत्याग्रह का महत्व बताती हैं। ‘राजस्थानी साहित्य में गांधी जी की अहिंसा’ विषयक पत्रवाचन में श्रीगंगानगर के डॉ. आशाराम भार्गव ने कहा कि गांधी जी की अहिंसा बौद्ध एवं जैन धर्म से प्रभावित थी। गांधी जी ने स्वयं माना है कि उन्होंने जो साहित्य पढ़ा, उसका उनके जीवन पर बहुत असर पड़ा है। उन्होंने राजस्थानी साहित्य की चर्चा करते हुए बताया कि राजस्थानी कवियों ने अहिंसा का महत्व बताते हुए बताया है कि अहिंसा पशुबल से बहुत बड़ा बल है और पशुबल से मुक्त होना ही सभ्यता है।
महाजन से आए डॉ. मदनगोपाल लढ़ा ने ‘राजस्थानी साहित्य में गांधी जी के मातृभाषा के संबंध में विचार’ विषयक पर्चा पढ़ा। उन्होंने कहा कि गांधी जी शिक्षा के लिए मातृभाषा को आवश्यक मानते थे। उनकी खुद की प्रारंभिक शिक्षा गुजराती में हुई थी। इस सत्र की अध्यक्षता बीकानेर से आई सीमा भाटी ने की। उन्होंने कहा कि मनुष्य भाषा, कार्यों और व्यवहार से ही पहचाना जाता है। अहिंसा का मार्ग सबसे बड़ा मार्ग है। उन्होंने इस सत्र में पढ़े गए सभी परचों की चर्चा करते हुए कहा कि ये सभी परचे एक दृष्टि प्रदान करने वाले हैं।
सत्र का संचालन सत्यपाल जोइया ने किया।
दूसरे सत्र में ‘राजस्थानी साहित्य में गांधी जी का नारी विमर्श’ विषय पर जोधपुर के डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने कहा कि हालांकि राजस्थानी साहित्य में गांधी जी के नारी विमर्श की बहुत कमी नजर आती है लेकिन फिर भी कुछ सामग्री मिल जाती है जो बताती है कि इक्कीसवीं सदी की नारी में जो स्वतंत्रता और आजादी नजर आती है। उसमें निसंदेह गांधी जी का भी बहुत योगदान था। उन्होंने गांधी एवं कस्तुरबा के अनेक उदाहरण देकर बताया कि किस तरह गांधी जी खुद मानते थे कि उन्हें ‘महात्मा गांधी’ बनाने में कस्तुरबा का बहुत बड़ा योगदान था। ‘राजस्थानी साहित्य में अस्पृश्यता’ विषयक पत्रवाचन में नोहर के डॉ. सतपाल खाती ने राजस्थानी कहानियों का जिक्र करते हुए छुआछूत और जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव का विस्तार से चित्रण किया। उन्होंने माना कि गांधी जी के विचारों का राजस्थान के लोगों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था और आगे चलकर उन्होंने गांधी जी के इन विचारों को राजस्थानी साहित्य में स्थान तो दिया ही, साथ ही उसका अनुसरण भी किया। सूरतगढ़ के डॉ. हरिमोहन सारस्वत ने ‘राजस्थानी साहित्य में गांधीवाद’ विषय पर पत्रवाचन करते हुए कहा कि गांधी जी के विचारों की उड़ान इतनी ऊंची है कि हर आदमी उस तक पहुंच ही नहीं पाता। उसकी जितनी भी चर्चा की जाए, कम है।
इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए हुए कृष्णकुमार ‘आशु’ (श्रीगंगानगर) ने कहा कि गांधी की प्रासंगिकता कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। गांधी के विचार बिना हम भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो लोग वैचारिक स्तर पर गांधी से उनके जीवनकाल में जीत नहीं पाए, वे आज उनकी हत्या के पचहत्तर वर्ष बाद भी उन्हें वैचारिक स्तर पर मारने के लिए छटपटा रहे हैं लेकिन उनकी पार नहीं पड़ रही। उन्होंने सत्र मेें पढ़े गए सभी परचों को सारगर्भित बताते हुए सराहना की। सत्र का संचालन हिंदी व्याख्याता एवं आलोचक डॉ. बबीता काजल ने किया।समापन सत्र के मुख्य अतिथ आत्मवल्लभ जैन कन्या महाविद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष अमरचंद बोरड़ ने राजस्थानी भाषा को मान्यता देने की बात कही और अकादेमी से इस तरह के कार्यक्रम करवाते रहने का आग्रह किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने परिसंवाद को सफल करार देते हुए माना कि आज के सभी पत्रवाचक युवापीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं और युवाओं को अगर गांधी की महता का पता है तो यह देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत हैं। साथ ही राजस्थानी साहित्य में गांधी की स्थिति भी अच्छी है।आभार विनोद शर्मा ने व्यक्त किया। संचालन राजू गोस्वामी ने किया। अंत में दो मिनट मौन रखकर राजस्थानी कवि मोहन आलोक को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में सभी साहित्यकारों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।  सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष संतोषकुमारी को भी सम्मानित किया गया।कार्यक्रम में हनुमानगढ़ से दीनदयाल शर्मा, अनूपगढ़ से अंजू स्वामी, सूरतगढ़ से माइडियर सारस्वत, फलोदी से बीएल पारस सहित श्रीगंगानगर शहर के अनेक साहित्यकार  एवं साहित्य प्रेमी मौजूद थे।