आर्थिक आधार पर वर्गभेद का खुलासा


ऋषिकेश राजोरिया 

भोपाल में कम वेतन के बावजूद दीक्षितजी ने मुझे कोई तकलीफ नहीं होने दीसिवाय इसके कि मेरी पत्नी इंदौर में इलाज करवा रही थी। दोनों बेटे भी वहीं थे और मैं इस स्थिति में नहीं था कि उनको पैसे भेज सकूं। दैनिक भास्कर का उन दिनों बड़ा विज्ञापन हो रहा थाजिसमें उसे देश का सबसे तेज बढ़ता अखबार बताया जा रहा था। मैं इतना कम वेतन तय होने के कारणों की पड़ताल में जुटा तरह-तरह के अनुमान लगा रहा था। एक अनुमान यह था कि ओम प्रकाश सिंह की वजह से यह सब हुआ होक्योंकि वे एनके सिंह के रिश्तेदार थे और बंबई में अखबार निकालने में असफल रहने के बाद देनदारियां बहुत ज्यादा बढ़ने से लापता हो गए थे। ऐसे में मेरी भोपाल में मौजूदगी शायद उन्हें ठीक नहीं लगी हो।

दूसरा अनुमान यह था कि जब अजित वडनेरकर मुझे छोड़ने उस झोपड़पट्टी तक ले गएजहां मैं बाबू दादा के यहां ठहरा थाउसका असर गलत पड़ा हो। वडनेरकर ने एनके सिंह से बात की हो और एनके सिंह ने मेरे बारे में समझ लिया हो कि यह लोअर क्लास का आदमी हैइसे उसी तरह ट्रीट किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए संभव है कि भारतीय समाज में व्यक्ति की आर्थिक हैसियत के आधार पर भयंकर किस्म का वर्गभेद है। जिसके पास चार पहिए की गाड़ी नहीं हैजिसका निवास संभ्रांत इलाके में नहीं हैवह कमजोर वर्ग का माना जाता है। बंबई इस तरह के वर्गभेद से मुक्त हैलेकिन देश के बाकी स्थानों पर यही सिलसिला कायम है। कुछ भी होमेरा वेतन कम तय होने के पीछे कुछ न कुछ कारण तो था हीवरना एनके सिंह ने आश्वस्त किया था कि ठीक वेतन मिलेगाफिर भी मेरे साथ बेईमानी क्यों हुई?

दीक्षितजी भी परेशान थे। इस मुद्दे पर उनसे मेरी अलग बहस हो जाती थी। वे मुझे समझाते कि यह विपरीत समय हैगुजार लोबाद में सब ठीक हो जाएगा। धीरजधर्ममित्रअरु नारी। आपद काल परखिए चारी। रामचरितमानस की इस चौपाई पर अमल करने के अलावा मेरे पास कोई अन्य उपाय भी नहीं था। मैं धीरज धारण किए हुए था। धर्म का पालन कर रहा था। दीक्षितजी जैसे मित्र साथ थे। पत्नी इंदौर में थीजहां मेरे माता-पिता और भाई अपनी पत्नियों के साथ रहते थे। प्रोफेसर कालोनी रहने के लिए शानदार जगह थी। फीचर सर्विस हम समवेत’ का साप्ताहिक बुलेटिन पास ही शामला हिल स्थित मुख्यमंत्री निवास में छपता था। उसकी व्यवस्था श्रीराम तिवारी करते थे। बुलेटिन निकालने का काम रत्नेश संभालता था। उसका भाई मुख्यमंत्री निवास में कर्मचारी था। मैं उसके साथ कई बार मुख्यमंत्री निवास चला जाता था।

जिन परिस्थितियों में मैं घिरा हुआ थाउसमें कोई भी बुरी तरह अवसाद से घिर सकता हैआत्महत्या जैसे कदम उठा सकता हैआतंकवादी बन सकता हैनक्सलवादी बन सकता है या अपराध के रास्ते पर कदम बढ़ा सकता है। दैनिक भास्कर में मेरे साथ जो कुछ हुआउसमें इस तरह की परिस्थितियां बन जाना आश्चर्य की बात नहीं है। दीक्षितजी ने मुझे इस तरह की परिस्थिति में फंसने से बचाया। साथ ही मुझे महिलाओं से भी दूर रखा कि मेरा कहीं किसी के साथ नैन मटक्का न हो जाए। उनके कारण मेरा ज्यादातर समय लिखने-पढ़ने में ही गुजरता था। उनके जैसा विनोद प्रिय और साथ ही अत्यंत गंभीर व्यक्ति मैंने पहले कभी नहीं देखा। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।

इसी दौरान 13 दिसंबर 2001 की सुबह साढ़े ग्यारह बजे संसद पर आतंकी हमला हो गया। वह घटनाक्रम मैंने दीक्षितजी के साथ उनके घर टीवी पर देखा। सफेद एंबेस्डर कार में पांच आतंकी पहुंचे थे। उनको बड़ी वारदात करने से रोकने में 9 सुरक्षा कर्मी शहीद हुए। पांचों आतंकी ढेर हो गए। आतंकियों और सुरक्षा कर्मियों की मुठभेड़ पौन घंटा चली। तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और विपक्ष की नेता सोनिया गांधी अपने निवास की ओर रवाना हो चुके थेगृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज सहित सौ से ज्यादा सांसद संसद भवन में मौजूद थे। इस घटना के बाद लोग बात करने लगे कि क्या पाकिस्तान पर हमला करने की तैयारी चल रही है