वो जो रिश्तों में एक गर्मी थी
हम जिसे दोस्ती समझते थे
जो थी इक धूप छाँव से बढ़ कर
जिसके साये में था सुकून बहुत
जब कभी ज़िन्दगी की आँच चुभी
बैठ जाता था आ के जिसके तले
भरके रिश्तों में इक उजास नया
गर्मजोशी से भर मैं जाता था
कोई मौसम हो कोई हो माहौल
मुझको ठंडा न करने पाया कभी
दोस्ती का वो सर चढ़ा सूरज
ढल न पाया कभी भी शाम ढले
अब मगर क्या हुआ ख़ुदा जाने
हो गया मैं शिकार सर्दी का
ढल गया दिन में ही मेरा सूरज
लबकुशाई को लग गयी है ठण्ड
क्या ये सर्दी यूँ ही रहेगी अब ?

©️✍️ *लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'*