वो जिसको देखा-भोगा है मैंने अपने बचपन में 

क़िस्सों और कहानी में है वही ग्राम्य-जीवन अब तो


सादी शैली और सरलता बदल गयी चालाकी में

जोड़ रहे हैं सभी धूर्तता गुणा भाग और बाकी में

क्षुद्र स्वार्थों और कुटिलता के ही पोखर हैं अब तो

हुई ज़िन्दगी कीचड़ जैसी कीचड़ की तैराकी में

कलियाँ हों या फूल कहाँ अब ख़ुशबू देते उपवन में

अधिक क्रूर होता जाता है सटा गाँव से वन अब तो


ज़ह्र बो रही है हरियाली फ़स्ल कहाँ देसी है अब

अधिक उपज का लालच भी तो करता है क्या-क्या करतब

कहाँ रही खेती अब पूजा ये भी तो व्यापार हुई

और अन्नदाता भी अब तो भूल गया अपना मज़हब

लड़ें आरती और अज़ानें इक दूजे के भंजन में

कव्वाली और भजन कीर्तन करें सिर्फ़ खण्डन अब तो


चौपालें दारू के अड्डे और जुआघर हैं मरघट

लोक-लाज मर्यादा का तो तार-तार है अब घूँघट

रिश्ते अब उथले पानी में ढूँढ रहे हैं गहराई

मन के जल की बाट देखता अब सूखा प्यासा पनघट

गाली का अश्लील शोर है अब छप्पर के निर्जन में 

औरत और बच्चों के हिस्से है बस एक रुदन अब तो


लोक-गीत के बोल नहीं हैं डीजे पर भद्दे गाने

जातिवाद सिरहाने बैठा हुई मनुजता पैताने

राजनीति ने खोद रखी है मज़हब की ऐसी खाई

जिसमें सब कुछ डूब रहा है जाने हो या अनजाने

भाव-राधिका सिसक रही है बिन कान्हा वृन्दावन में

और नेह की मथुरा में भी रोता प्रेम-पवन अब तो

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'