छूट गया नरीमन पाइंट

ऋषिकेश राजोरिया 

जिंदगी अपनी गति से आगे बढ़ रही थी। जनसत्ता का कार्यालय एक्सप्रेस टॉवर से हटा दिया गया था। लालबाग में नया कार्यालय बन गया था। नया कार्यालय पहुंचने के लिए हमें करी रोड या चिंचपोकली रेलवे स्टेशन पर उतरना पड़ता था। बंबई का नाम मुंबई 1995 में ही हो चुका थाजब महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा की सरकार बनी थी। केंद्र में इंद्रकुमार गुजराल की सरकार 28 नवंबर 1997 को गिर गई। इसके बाद देश में एक बार फिर लोकसभा चुनाव हुए। 15 मार्च 1998 तक नई लोकसभा गठित करने के आदेश जारी हुए ।

चुनाव आयोग ने चार चरणों में लोकसभा चुनाव कराना तय किया और 16, 22, 28 फरवरी और मार्च को मतदान हुआ। 10 मार्च 1998 को 12 वीं लोकसभा का गठन हुआ। एक बार फिर त्रिशंकु लोकसभा बनी। एक तरफ कांग्रेस और उसके सहयोगी दल थेदूसरी तरफ भाजपा और उसके सहयोगी दल थेतीसरा पक्ष संयुक्त मोर्चा में शामिल पार्टियों का था। चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रपति के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया। नौ दिन बाद राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई। इस तरह अटलजी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने।

इस दौरान मैं जनसत्ता की नौकरी कर रहा था। लालबाग के नए कार्यालय में कंप्यूटर लगने लगे थे। एक कंप्यूटर इंजीनियर ने संपादकीय विभाग के हम सभी लोगों को कंप्यूटर सिखाया। करीब बीस दिन रोजाना दो तीन घंटे हम कंप्यूटर सीखते रहे। पहले दिन उसने कंप्यूटर के बारे में जो समझायावह अब तक याद है। उसने कहा कि कंप्यूटर गणेशजी का प्रतीक है। गणेशजी अक्षरों के देवता हैं और कंप्यूटर अक्षरों से चलता है। गणेशजी का वाहन मूषक अर्थात चूहा है। इसे अंग्रेजी में माउस कहते हैं। कंप्यूटर माउस से चलता है। उसने कंप्यूटर से पेज लगाने का प्रशिक्षण हमें दिया था। कैसे फाइल बनाते हैं। कैसे मैटर सेट करते हैं। कैसे फोटो लगाते हैं। उस समय मैंने पेज लगाना सीख लिया था।

कंप्यूटर सीखने के लिए उन दिनों सुबह आठ बजे भाइंदर से लोकल ट्रेन पकड़नी पड़ती थी। 11-12 बजे तक कंप्यूटर कक्षा खत्म हो जाती तो वापस भाइंदर पहुंचता फिर शाम को बजे वापस। दिमाग कंप्यूटर सीखने के लिए तैयार हो गया था। कंप्यूटर सीखने के बाद भी हमने कंप्यूटर पर काम शुरू नहीं किया। सिर्फ विवेक अग्रवाल ही थाजिसने कार्यालय में सबसे पहले कंप्यूटर का उपयोग शुरू किया। वह अपनी कापियां कंप्यूटर पर टाइप करने लगा था। मैंने कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग सीखने की कोशिश नहीं की थी। मुझे अपनी हैंडराइटिंग पर गर्व भी था।

भाइंदर में जहां मैं रहता थावहां कई लोगों से परिचय हो चुका था। कई पत्रकार भाइंदर में रहते थे। द्विजेन्द्र तिवारीदीपक पाचपोरसतीश पेडणेकरहिंदी स्क्रीन के आनंद मुखर्जीगणेश नंदन तिवारीविजयशंकर चतुर्वेदी सहित और भी पत्रकारों का भाइंदर में निवास था। वह एक विकासशील कस्बा था। वहां भाइंदर भूमिछम्मी संदेश जैसे स्थानीय अखबार भी निकलते थे। छम्मी संदेश पवन ठाकुर नामक व्यक्ति निकालता थाजिससे राकेश दुबे ने परिचय करवाया था। वह कई संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त रहता था।

एक गौतम जैन थेजो विचित्र व्यक्ति थे और कभी कभी बगैर किसी रजिस्ट्रेशन के श्मशान भूमि शीर्षक से अखबार छापकर लोगों के बीच बांट देते थे। वे अनिल अग्रवाल के काफी नजदीकी थेजो उस समय उभरते हुए उद्योगपति थे और आज वेदांता के मालिक हैं। गौतम जैन ने छत्तीसगढ़ में अखबार निकालने का विचार किया। छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस नाम से कैसा अखबार छापा जा सकता हैइसकी टेब्लाइड साइज की डमी हमने छापी। वे रायपुर भी गएलेकिन मामला सिरे नहीं चढ़ा। लौटने के बाद कहने लगे कि भोलेनाथ की इच्छा नहीं है।

भाइंदर में जनसत्ता के अंशकालिक संवाददाता देवेन्द्र पोरवाल का भी अच्छा दबदबा था। राहुल देव ने बंबई में यह व्यवस्था कर दी थी कि किसी भी क्षेत्र की खबर वहां का अंशकालिक संवाददाता ही भेजेगा। अगर कोई दफ्तर का पत्रकार भी है तो वह उस क्षेत्र की खबर नहीं भेजेगा। इस व्यवस्था से भाइंदरवसईविरारकल्याणडोंबिवलीउल्हासनगरअंधेरी सहित विभिन्न क्षेत्रों में अंशकालिक संवाददाताओं का महत्व बढ़ा हुआ था।