इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनल, नए युग की शुरुआत
ऋषिकेश राजोरिया
दुनिया में वर्ल्डवाइड वेब का धमाकेदार प्रवेश हो चुका था। WWW…..। बंबई में इंटरनेट का उपयोग शुरू हुआ। हम लोगों को इसकी भनक तक नहीं थी। सिर्फ खबरें पढ़ते थे। बंबई का पहला इंटरनेट कैफे 1996 में लीला होटल में खुला था। इसके बाद दिल्ली के आईटीसी मौर्य होटल में साइबर क्लब नाम से इंटरनेट कैफे खुला। इसी दौरान एक्सप्रेस टॉवर के पिछले हिस्से में हमारे सामने एक इंटरनेट कैफे खुला। आमिर खान और जूही चावला उद्घाटन करने आए थे। यहां इंटरनेट का उपयोग करने का शुल्क 150 रुपए प्रति घंटा था। मोबाइल की दस्तक और इंटरनेट का चलन युगांतरकारी घटनाएं थीं और इससे दुनिया कितनी बदल जाने वाली है, इसका अनुमान उस समय नहीं लगाया जा सकता था। हम कलम कागज का ही इस्तेमाल करते थे। ऑपरेटर मैटर कंपोज करते। प्रूफ रीडर मैटर पढ़ते। पेज मेकर पेज लगाते थे। कंप्यूटर आने से अब चार लोगों का काम एक ही व्यक्ति कर लेता है।
जीटीवी ने एक से ज्यादा निजी चैनल शुरू कर दिए थे। स्टार टीवी आ गया था। कैबल टीवी भी आ गया था। दूरदर्शन का भी एक और महानगरीय चैनल मेट्रो शुरू हो चुका था। तब तक दूरदर्शन पर कुछ समाचार बुलेटिन प्रसारित होते थे। इनमें रात नौ बजे वाला बुलेटिन देश में बहुत से लोग देखते थे। समाचार वाचिकाएं स्टार मानी जाती थीं। शोभना जगदीश का नाम अब तक याद है। समाचारों के इस परंपरागत सिलसिले से अलग हटकर दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर रात 10 बजे आज तक नाम से एक समाचार कार्यक्रम शुरू हो चुका था, जिसे मशहूर पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह प्रस्तुत करते थे। 27 जून 1996 को सुरेन्द्र प्रताप सिंह का निधन हो गया। राहुल देव ने उनकी जगह ली और एंकर बन गए।
जनसत्ता में राहुल देव का कार्यकाल हमेशा के लिए समाप्त हो गया। प्रभाषजी संपादकीय सलाहकार बने हुए थे। राहुल देव के जाने के बाद अच्युतानंद मिश्र ने कार्यकारी संपादक पद संभाला। वे पहले जनसत्ता, बंबई के स्थानीय संपादक रह चुके थे। कार्यकारी संपादक बनने के बाद उन्होंने बंबई की यात्रा की। वे वीटी के पास रेलवे होटल में रुके थे। मैंने उनके बारे में बहुत सुना था, लेकिन कभी देखा नहीं था। मैं उनसे मिलने रेलवे होटल चला गया। वे आत्मीयता से मिले। उनका व्यक्तित्व मुझे सहज और सरल लगा। मेरे बारे में वे जानते थे या नहीं, इसकी जानकारी मुझे नहीं थी। जनसत्ता के कार्यालय में साथियों से मिलने के बाद वे वापस दिल्ली चले गए।
अब राहुल देव जनसत्ता में बिलकुल नहीं थे। लोग उन्हें मेट्रो चैनल के आज तक कार्यक्रम में खबरें पढ़ते हुए देखने लगे थे। इस काम में वे सफल रहे। इस घटनाक्रम के 3-4 माह बाद 28 नवंबर 1997 को केंद्र में प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल की सरकार गिर गई। इस तरह दो साल के भीतर देश में तीन प्रधानमंत्री हो चुके थे। उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष थे और उन्होंने राजीव गांधी की हत्या में द्रमुक नेताओं का हाथ होने का आरोप लगाते हुए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई।
राहुल देव जब जनसत्ता के कार्यकारी संपादक बनकर दिल्ली चले गए थे, तब ओम प्रकाश सिंह का दिल्ली में रहना मुश्किल हो गया था और वे बंबई लौट आए। उन्होंने अपना अखबार शुरू करने का फैसला किया। कांदीवली में जगह ली। संसाधन जुटाए और अखबार निकालने से पहले चर्चगेट के पास केसी कालेज में अपने अखबार भारत स्वराष्ट्र के कार्यारंभ दिवस समारोह का आयोजन किया। ओम प्रकाश सिंह के साथ बंबई में काफी समय गुजरा था। दादर में शर्मा रेस्टारेंट में उनके साथ कई अनौपचारिक बैठकें होती थीं। उनके प्रशंसकों में उस समय चंदर मिश्रा, प्रेम शुक्ल, अश्विनी कुमार मिश्र, प्राण धाबर्डे, मैं और कुछ अन्य पत्रकार शामिल थे। उन्होंने अखबार का जो कार्यारंभ दिवस समारोह किया, उसमें मुख्य अतिथियों में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी शामिल थे।
अपने संपर्कों का लाभ उठाकर ओम प्रकाश सिंह ने नामी लोगों को समारोह में बुला लिया था। उस दिन के लिए जो अखबार छापकर बांटा गया, वह ब्राडशीट पर फुल साइज में छपा था और पहले पेज से लेकर आखिरी पेज तक कहीं भी कोई खबर उसमें नहीं छपी थी। ओम प्रकाश सिंह ने शुरू से आखिरी तक एक नाटक छाप दिया था। कहीं से किताब मिली होगी। उसको कंपोज करवा लिया और पूरे अखबार में छाप दिया। बाद में उन्होंने अल्प समय तक सांध्यकालीन अखबार चलाया था।
बंबई में हिंदी पाठकों के लिए संझा जनसत्ता, दोपहर का सामना, हमारा महानगर, निर्भय पथिक, दोपहर दो बजे लोकप्रिय शाम के अखबार थे। बंबई से लगाकर पूरे ठाणे जिले के कोने कोने तक इन अखबारों की पहुंच थी। सांझ समाचार भी निकल रहा था। कुछ दिन उसका संपादन सलिल सुधाकर ने संभाला। सलिल सुधाकर कलम के धनी हैं और बहुत अच्छी अच्छी चीजें लिखते हैं। राजनीतिक तौर पर भी अत्यंत जागरूक हैं। कई कहानियां लिख चुके हैं।
कुबेर टाइम्स के संपादक हरीश पाठक थे। उनका कार्यालय सांताक्रुज में था, जहां मैं उनसे मिलने गया था। वे अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी हैं और कलम का इस्तेमाल करने में सिद्धहस्त हैं। नंद किशोर नौटियाल ने साप्ताहिक नूतन सवेरा निकाला था, जिसे आलोक भट्टाचार्य संभालते थे। आलोक भट्टाचार्य का व्यक्तित्व शानदार था। ज्यादातर सफारी सूट पहनते थे। भाषा पर उनका अच्छा अधिकार था। भाषण और लेखन, दोनों प्रतिभाएं उनमें थीं। उन पर सरस्वती की अनुकंपा थी। सबरंग धीरेन्द्र अस्थाना संभाल ही रहे थे। उनके बारे में ज्यादा नहीं लिख सकते, क्योंकि वे बड़े लेखक हैं, साहित्यकारों के बीच उनका बड़ा नाम है, उनके कद में और मेरे कद में बहुत अंतर है। इस तरह बंबई में हिंदी पत्रकारिता का वातावरण बना हुआ था। सुबह के अखबारों में जनसत्ता और नवभारत टाइम्स प्रमुख अखबार थे ही, कुबेर टाइम्स भी शुरू हो गया था। धर्मयुग, माधुरी आदि का जमाना गुजर चुका था।

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