रिक्त हुआ है भोग-पियाला लेकिन मन को तृप्ति कहाँ
तलछट पर भी इसकी नीयत बिगड़ी-बिगड़ी जाती है
रूप की मदिरा बल की हाला धन-वैभव का आकर्षण
जीवन भर ही इन तीनों में लिप्त रहा ये मेरा मन
जितना इनको पाया मैंने उतनी चाह बढ़ी इनकी
छूट न पाया मुझसे अब तक ये भरमाता सम्मोहन
भोग चाह है भोग साध है भोग लक्ष्य है जीवन का
मेरी ये अतृप्त कामना अब भी यह समझाती है
मेरी जन्म-कुण्डली में ये शुक्र बहुत ही प्रबल रहा
मैंने इसके तीव्र असर को पूरे मन से ख़ूब गहा
जिस्म सदा मेरे विवेक को यहाँ जीतता आया है
और मेरे इस मन ने भी तो इसी जिस्म को ख़ूब सहा
ढीले अब काया के कसबल लेकिन अब भी बना ययाति
सुप्त वासना अब भी देखो अपना शीश उठाती है
लेकिन तलछट तो तलछट है इससे प्याले कब भरते
केवल कुछ क़तरों से कब ये चाहत के झरने झरते
तलछट में भी ढूँढ रहा है मैं अपनी कुछ प्यासों को
जीने के अरमान बहुत हैं इस मन में मरते-मरते
भूल रहा हूँ धीरे-धीरे वे चुम्बन वे आलिंगन
लेकिन मेरे अधरों की ये प्यास नहीं मर पाती है
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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