शत्रुघ्न सिन्हा के कार्यक्रम के लिए रिसर्च
ऋषिकेश राजोरिया
राहुल देव के दिल्ली जाने के बाद जनसत्ता, संझा जनसत्ता और सबरंग का कामकाज पहले की तरह चलता रहा। सभी नौकरी कर रहे थे। समय पर ड्यूटी पर पहुंचते और काम पूरा कर लौट जाते। इनमें मैं भी शामिल था। कभी कभी कार्यक्रमों में जाना होता था। बंबई में कई कार्यक्रम होते रहते थे। एक बार साकीनाका में राकेश दुबे के परिचित एक स्कूल संचालक ने स्कूल में कबड्डी टूर्नामेंट किया। पुरस्कार वितरण करने के लिए मुख्य अतिथि बनाकर मुझे बुलाया। मैं और राकेश दुबे वहां पहुंचे। पुरस्कार वितरण के बाद भोजन का भी प्रबंध है, ऐसा कहा गया था। शाम का समय था। कार्यक्रम खत्म होते होते दस बज गए। इसके बाद हमें स्कूल के एक कमरे में बैठाया गया। मैं, राकेश दुबे, स्कूल संचालक और दो तीन लोग। स्कूल संचालक ने भोजन के नाम पर अंडे उबालकर दे दिए। हैरानी की बात थी। हमने बाद में एक रेस्तरां में कुछ खाया, उसके बाद घर गए। एक बार पवई में एक स्कूल में वाद विवाद प्रतियोगिता में निर्णायक बनाकर बुलाया गया। इस तरह मंथर गति से दिन गुजर रहे थे।
सीमा मुरलीधर ने जीटीवी छोड़कर स्टार के लिए कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया था। कार्यक्रम था शॉटगन शूट आउट। इसमें शत्रुघ्न सिन्हा दो तीन विशिष्ट मेहमानों के साथ राजनीतिक बहस करते थे। टीवी पर इस तरह का कोई भी कार्यक्रम बनाने से पहले रिसर्च की जरूरत होती है। रिसर्च में सीमा कई बार मेरी मदद लेती थी। विले पार्ले में नानावटी अस्पताल के परिसर में एक तरफ स्टूडियो था, जहां इस कार्यक्रम की शूटिंग होती थी। कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता शत्रुघ्न सिन्हा होते थे। मेहमान अलग कुर्सियों पर बैठते थे और सामने गोलाई में जनता के प्रतिनिधि के रूप में कुछ लोग बैठते थे, जो मेहमानों से सवाल पूछते थे। जनता के प्रतिनिधि के रूप में मैं भी बैठ जाता था। उस कार्यक्रम की अलग-अलग कडियों में जिन लोगों से रूबरू होने का मौका मिला, उनमें नीतीश कुमार, जावेद अख्तर, उमा भारती के नाम याद हैं। उस कार्यक्रम में एक बार गणेश नंदन तिवारी भी साथ में गया था और कार्यक्रम के बाद शत्रुघ्न सिन्हा से अलग से बातचीत की थी।
उस दौरान जनसत्ता का प्रभार संभालने दिल्ली से प्रदीप सिंह आ गए। वे राहुल देव के घनिष्ठ मित्र थे। उन्हें उप स्थानीय संपादक बनाया गया था। उनके लिए आलीशान फ्लैट की तलाश शुरू हुई। वे अंधेरी में रहने लगे। दिल्ली में राहुल देव किस तरह जनसत्ता चला रहे होंगे, इसकी कल्पना ही की जा सकती थी। जनसत्ता का बंबई संस्करण संभालना मुश्किल नहीं था, क्योंकि सारा मैटर दिल्ली से आ जाता था। यहां राजनीति करने का समय भी मिल जाता था, लेकिन दिल्ली की बात अलग थी। वहां पूरे अखबार की रचना करनी होती थी। संपादकीय लिखने पड़ते थे। लेख तय करने पड़ते थे। रविवारीय परिशिष्ट में भी स्तरीय सामग्री प्रकाशित करनी होती थी।
पहले यह सब प्रभाषजी के मार्गदर्शन में होता था। अब राहुल देव का मार्गदर्शन शुरू हो गया था। जनसत्ता को स्टार पेपर बनाने में प्रभाषजी की टीम का योगदान था, जिसके तमाम सदस्य बहुत अच्छे लेखक थे। हरिशंकर व्यास, राम बहादुर राय, आलोक तोमर, मंगलेश डबराल, ज्योतिर्मय, श्रीशचंद्र मिश्र, विवेक सक्सेना सहित जितने पत्रकार थे, वे सब दमदार लेखक थे। राहुल देव बोलने वाले पत्रकार थे। उन्हें बोलना अच्छा लगता था। राहुल देव के विपरीत प्रदीप सिंह हद से ज्यादा खामोश रहने वाले पत्रकार थे। जहां राहुल देव के खास लोगों में अनिल सिन्हा, दीपक पाचपोर थे, वहीं प्रदीप सिंह की नजदीकी देवेन्द्र राठौर से बढ़ी।
हिंदी पत्रकार संघ की गतिविधियां ठंडी पड़ गई थीं। जनसत्ता के तेवर भी ठंडे पड़ने लगे थे। सबरंग का काम धीरेन्द्र अस्थाना संभाले हुए थे और राकेश श्रीमाल उनका खास सहयोगी बन चुका था। रेखा देशपांडे फिल्म का पेज संभालती थी। एक बार मैं निमंत्रण पर अमोल पालेकर की एक फिल्म देखने गया, “थोड़ा सा रूमानी हो जाएं”, जिसमें नाना पाटेकर की प्रमुख भूमिका थी। इरोज टाकीज में फिल्म देखी। रिट्ज होटल में उसकी पार्टी थी। मैंने उस फिल्म की समीक्षा लिखकर छपने के लिए दी। रेखा देशपांडे ने मेरी कॉपी को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया और कहा, इस तरह कहीं भी लार टपकाते हुए चले जाना और कुछ लिखकर ले आना अच्छी बात नहीं है। मैं उसकी बात से हैरान था। लेकिन क्या कर सकता था?

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