ऐवाने-ग़ालिब दिल्ली ने मुशायरे का आयोजन किया । 

जयपुर से मैं और जनाब राही शहाबी साहब मरहूम शिरक़त करने दिल्ली पहुँचे । ख़ुमार साहब , नूर साहब , अज़हर इनायती , वसीम बरेलवी , मुमताज़ राशिद जैसे बड़े शाइरों के साथ मुशायरा बहुत कामयाब रहा । रात 2 बजे जब मुशायरा ख़त्म हुआ तो ख़ुमार साहब राही साहब से बोले "राही तुम कहाँ ठहरे हो ?" राही साहब मेरे लिये बोले "इनके साथ" । 

मैं उन दिनों अक्सर अपने कारोबारी सिलसिले में दिल्ली जाता रहता था और दिल्ली के राजौरी गार्डन स्थित होटल अमन में ही हमेशा मेरा कमरा बुक रहता था । 

ख़ुमार साहब बोले "हम भी तुम्हारे साथ चलेंगे" । ख़ुमार साहब बात आदेश थी । हम तीनों मेरी मोटर से होटल आ गये । कमरे में एक एक्स्ट्रा बैड की व्यवस्था भी तब तक हो चुकी थी । 

कपड़े चेन्ज़ करके पहले तो हम तीनों ने ब्रैड-ऑमलेट और पनीर टिक्का वगैरा खाया , कॉफ़ी पी । उसके बाद ख़ुमार साहब और राही साहब कालीन पर बैठ कर ताश खेलने लगे । मैं बिस्तर पर बैठा दोनों को देख रहा था । 

खेल पैसों से खेला जा रहा था , ख़ुमार साहब लगातार तीन बाज़ी हार चुके थे । चौथी बाज़ी के पत्ते जब बँटे तो बिना अपने-अपने पत्तों से निगाह हटाये जो संवाद दोनों के मध्य हुआ , वह यूँ था :--

ख़ुमार  - "राही"

राही  - "जी चचा"

ख़ुमार - "रोयेंगे साले"

राही - "कौन चचा"

ख़ुमार -"भतीजे तुम्हारे"

राही - "क्यों चचा"

ख़ुमार - "सोच रहे होंगे कि अब्बा कमाने गये हैं , अब्बा साले यहाँ ऐसी-तैसी करा रहे हैं"

कमरे में हम तीनों का ठहाका गूँज उठा । 

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'