राहुल देव दिल्ली चले गए

ऋषिकेश राजोरिया

राहुल देव दिल्ली चले गए। जनसत्ता के कार्यकारी संपादक बन गए। उस जनसत्ता केजिसके प्रधान संपादक प्रभाष जोशी थे। अगर राहुल देव दिल्ली नहीं जातेबंबई में ही बने रहते तो क्या होतामहाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा की सरकार बन चुकी थी। बंबई की 28 में से एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिली थी। फिर भी मुरली देवड़ा बंबई प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने हुए थे। राहुल देव ने शिवसेना से गजब का पंगा लिया था और जनसत्ता का इस्तेमाल करते हुए देश के बड़े बड़े पत्रकारों को शिवसेना भवन के सामने धरने पर बैठा दिया था। यह तो बाल ठाकरे ने बुद्धिमानी दिखाई कि अपने शिवसैनिकों को कुछ भी करने से रोक दियावरना क्या हो जातापता नहीं।

शायद राहुल देव ने यह नहीं सोचा होगा कि महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार भी बन सकती है। शिवसेना भाजपा की सरकार बनने के बाद क्या राहुल देव चैन से बंबई में रह सकते थेलेकिन उनकी किस्मत जोरदार थी। रामनाथ गोयनका नहीं रहे थे। अक्टूबर 1991 को उनका निधन हो चुका था। इंडियन एक्सप्रेस का कारोबार विवेक गोयनका के अधीन आ चुका था। राहुल देव ने समूह में तगड़ी जमावट कर ली थी और प्रभाषजी के उत्तराधिकारी बन बैठे थे। जनसत्ताबंबई में उनकी जगह कौन ले सकता हैइसको लेकर कयास लगने लगे थे। बदलाव के इस दौर का मेरे दिमाग पर भी गहरा असर हो रहा था। पत्रकारिता को लेकर दिमाग में जो तस्वीर बनी हुई थीवह बिगड़ने लगी थी। आदर्श और सिद्धांतों की व्यवहार में किस तरह धज्जियां उड़ती हैंइसका अनुभव लगातार हो रहा था।

एक बार प्रभाषजी बंबई में ओबेराय होटल में रुके थे। मुझे पता चला कि वे सुबह की फ्लाइट से दिल्ली लौटने वाले हैंतब मैं अल सुबह उनसे मिलने ओबेराय होटल पहुंच गया। उन्होंने मुझे एक सेब खिलाया। मेरे सामने दिल्ली जाने के लिए तैयार हुए। मैं उनके साथ एक फिएट कार में सांताक्रुज एयरपोर्ट तक गया था। राहुल देव एंड कंपनी के खिलाफ मेरे पत्र व्यवहार को उन्होंने देखा था और कभी कोई नाराजगी जाहिर नहीं की थी। शिवसेना के खिलाफ राहुल देव के अभियान के बारे में भी उन्हें पता चल चुका था कि इसमें जनसत्ता का अच्छा खासा दुरुपयोग हुआ है। और दाऊद इब्राहिम गिरफ्तारटाइगर मेमन की हत्या वाली खबर तो थी ही। इतना सबकुछ होने के बाद भी प्रभाषजी कुछ करने की स्थिति में नहीं थे।

एयरपोर्ट पर विमान में सवार होने से पहले उन्होंने मेरी पीठ ठोकते हुए कहा कि अपनी लाइन पर चलते रहनाकिसी से घबराना मत। कोई भी बुराई ज्यादा समय तक नहीं रहती है। उनके शब्द मुझे सांत्वना जैसे लगेलेकिन उसका क्या लाभराहुल देव को अखबार से जितना फायदा उठाना थाउन्होंने उठा लिया था। मैं अगर राहुल देव का चमचा बनकर रहतातो तय है कि बहुत तरक्की करता। दो तीन जगह मकान बना लेता और प्रमोशन भी अच्छा खासा होता। मैं उनके विरोध में रहता थाफिर भी वे मुझे पसंद करते थेयह बात सबको मालूम थी। मैं सोचने लगा था कि जनसत्ता में इससे आगे बढ़ना मुश्किल है। लेकिन कहां जाताबंबई में जितने हिंदी अखबार थेउन सबके दफ्तरों में मेरा आना जाना था।

एक बार दिल में आया कि कहीं दूसरी जगह नौकरी खोज लेनी चाहिए। इस सिलसिले में मैं हमारा महानगर (हिंदीके संपादक अनुराग चतुर्वेदी से भी मिलने गया था। एक बार भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के प्रमुख एएस सामरा के पास चला गया। उनसे पूछा कि अखबार वाले जो भ्रष्टाचार करते हैंउनके खिलाफ आप क्या कार्रवाई कर सकते हैंउन्होंने कहाएसीबी सरकारी स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार पर ही कार्रवाई कर सकता है। मेरे दिमाग में उधेड़बुन चलती रहती थीजिससे प्रेरित होकर मैं भटकता रहता था। शाम को दफ्तर में ड्यूटी और दिनभर जनसंपर्क।

इस सिलसिले के दौरान 21 सितंबर 1995 की शाम को जब मैं दफ्तर पहुंचा तो जबरदस्त हंगामा था कि दुनिया भर में गणेश प्रतिमाएं दूध पी रही हैं। गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने के लिए जगह-जगह लोगों की कतार लगी थी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने भी गणेश प्रतिमा को दूध पिलाया। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी ने गणेश प्रतिमा को दूध पिलाया। देश भर में जंगल में आग की तरह यह खबर फैली हुई थी कि गणेशजी दूध पी रहे हैं। वैज्ञानिक इसके कारण खोजने में जुटे। किसी वैज्ञानिक ने बताया कि सर्फेस टेंशन के कारण ऐसा संभव हैलेकिन यह कोई नहीं बता पाया कि गणेश प्रतिमाओं पर यह नियम सिर्फ 24 घंटे के लिए ही लागू क्यों हुआवह एक अजब गजब घटना थीजिसका ओरछोर किसी की समझ में नहीं आया।