कभी मुखड़ा

कभी देव

कभी दर्पण

कभी थाली

कभी रोटी

कभी कटार

और भी न जाने 

क्या-क्या

किस-किस जैसे

लगते हो तुम

लेकिन

एक बात तो बताओ

वो बुढ़िया

क्या हुई 

जो

काता करती थी

चरखा

तुम्हारी 

चमकीली गोद में

बैठकर ?

अगर वो

कात रही है

अब भी 

तो 

निरन्तर

कमज़ोर क्यों

होता जा रहा है

सूत

तुम्हारी चाँदनी का ?

और

ये जो दाग़ है

तुम्हारे रुख पर

ये 

किस बात

किस ग़लती

किस चूक

किस भूल

किस पाप

या

किस शाप 

का परिणाम है ?

कितने युग 

बीत गये

ये 

अब तक 

धुला क्यों नहीं ?

और हाँ

क्या कुछ 

छन जाता है 

कम नज़र

आता है

ये मनहूस दाग

छलनी से 

देखने पर ?

बोलो 

कुछ तो बोलो

चाँद !

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'