महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-भाजपा सरकार

ऋषिकेश राजोरिया 

बंबई में विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग मेरे लिए नया अनुभव था। कोई खास बीट नहीं थी। रोजाना मैं ही तय करता कि कहां किसकी रिपोर्टिंग करनी है। तीन पार्टियों के उम्मीदवार मैदान में थे। कांग्रेसभाजपा और शिवसेना। भाजपा और शिवसेना तालमेल करते चुनाव लड़ रही थी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी उस समय नहीं बनी थी। मैं अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी पार्टीकभी शिवसेनाकभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के उम्मीदवार का प्रचार देखने पहुंच जाता था। आचार संहिता लागू होने से उम्मीदवारों का जनसंपर्क पर जोर ज्यादा था। उन्हें आचार संहिता से घबराते हुए चुनाव प्रचार करते देखना मनोरंजक था। कांग्रेस का सत्ता में लौटना मुश्किल नजर आ रहा था। महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों पर चुनाव हो रहे थे। भाजपा 116 पर और शिवसेना 169 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। कांग्रेस ने 286 सीटों पर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने 65 और शिवसेना ने 73 सीटें जीतीं। कांग्रेस को 80 सीटें मिलीं। अन्य पार्टियों में जनता दल को 11, माकपा को और समाजवादी पार्टी को सीटें मिलीं। शेतकरी कामगार संगठन को और अन्य पार्टियों को सीटें मिलीं। 45 निर्दलीय जीते।

इस चुनाव परिणाम के साथ महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-भाजपा की सरकार बनने का रास्ता प्रशस्त हुआ। मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने। गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री। एमएलए होस्टल में कुछ समय जिनके कमरे में रहने का मौका मिला थावे घाटकोपर के विधायक प्रकाश मेहता भी मंत्री बन गए थे। उल्हासनगर से पप्पू कालानी और वसई से हितेन्द्र ठाकुर भारी बहुमत से चुनाव जीत गए थे। पप्पू कालानी को जेल से विशेष तौर पर शपथ ग्रहण के लिए महाराष्ट्र विधानसभा लाया गया था। शिवसेना-भाजपा की सरकार बनने से दोपहर का सामना में काम करने वालों की चांदी हो गई।

विधायकों की संख्या बढ़ने से शिवसेना को राज्यसभा में अपने सदस्य भेजने का मौका मिला। शिवसेना मराठी आधारित पार्टी थीलेकिन दिल्ली में हिंदी का महत्व थाइसलिए उसने प्रीतीश नंदी और संजय निरुपम को राज्यसभा सदस्य बना दिया। चुनाव के बाद मेरी दिनचर्या फिर सामान्य हो गई। प्रभाषजी ने दिल का ऑपरेशन करवाया था। इस सिलसिले में वे कई दिन बांबे हास्पिटल में भर्ती रहे थे। वहां उनके साथ काफी समय गुजारा। वे हर रविवार कागद कारे स्तंभ लिखने लगे थे। हास्पिटल के कमरे में वे अपना स्तंभ बोलकर लिखवाते थे। एक बार उनका स्तंभ द्विजेन्द्र तिवारी ने लिखा था। इसके बाद उन्होंने प्रधान संपादक पद छोड़ दिया और संपादकीय सलाहकार हो गए। राहुल देव कार्यकारी संपादक बनने के बाद दिल्ली चले गए। बंबई के एक्सप्रेस टॉवर में उनकी कुर्सी कुछ दिन खाली रही। राहुल देव के नहीं रहने पर लगा कि जनसत्ता का काम बगैर स्थानीय संपादक के भी भलीभांति चल सकता है।

चंदर मिश्र ने प्लस चैनल में नौकरी शुरू कर दी थी। एक बार उससे मिलने अंधेरी गया तो वहां महेश भट्ट और सोनी राजदान मौजूद थे। वे दफ्तर का निरीक्षण कर रहे थे। एक दिन मैं बीआर चोपड़ा से मिलने खार में उनके दफ्तर पहुंच गया। उनका अलग ही तरह का प्रभावशाली व्यक्तित्व था। खास तौर से दूरदर्शन पर महाभारत देखने के बाद मैं उनसे काफी प्रभावित था। करीब एक घंटा उनसे बातचीत की। उनके साथ चाय पी। उनसे पूछा कि क्या मुझे फिल्म जगत में पांव रखने का मौका मिल सकता है। इस पर उन्होंने कहा कि फिल्मों में काम करना फुलटाइम जॉब है। उसमें भी काम का कुछ तय नहीं होता है। कभी मिलता हैकभी नहीं मिलता है। पार्ट टाइम काम करने की गुंजाइश यहां नहीं होतीक्योंकि इतने सारे स्ट्रगलरों के होते हुए किसी को पार्ट टाइम रखना उनके साथ अन्याय है। अगर तुम्हें फिल्मों में काम करना है तो इंडियन एक्सप्रेस की नौकरी छोड़नी पड़ेगी। और मैं तुम्हें ऐसा करने की सलाह नहीं दे सकता। बीआर चोपड़ा का इंटरव्यू राकेश श्रीमाल ने जनसत्ता के फिल्म पेज पर लगाया और उसका शीर्षक अपने हिसाब से दियाजो मुझे अच्छा नहीं लगा।

इसी बीच देश में मोबाइल फोन ने दस्तक दी। 31 जुलाई 1995 को पहली बार कोलकाता में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने संचार मंत्री सुखराम को मोबाइल पर दिल्ली फोन किया था। तब कोलकाता में मोदी टेल्सट्रा कंपनी ने मोबाइल नेट सेवा की शुरूआत की थी। जहां तक मुझे याद आता हैबंबई में ओबेराय होटल में सुनील गावस्कर ने मोबाइल का बटन दबाया था। उस समय मोबाइल फोन पर इनकमिंग काल रुपए प्रति मिनट और आउटगोइंग काल 16 रुपए प्रति मिनट थी। मोबाइल फोन को लेकर हम तरह तरह की बातें करने लगे थे। पेजर की विदाई का समय आ चुका था।