(1)
सबमें रावण बस रहा ,
सबमें बसते राम ।
युगों युगों से चल रहा ,
दोनों में संग्राम ।।
(2)
दोनों की ही संगिनी ,
हैं देवी का रूप ।
शक्ति स्वरूपा सूर्य वे ,
जिनकी अपनी धूप ।।
(3)
अगर भरत पर है यहाँ ,
राघव को अभिमान ।
कुम्भकर्ण सा भ्रात है ,
रावण की भी शान ।।
(4)
अगर विभीषण को वहाँ ,
रावण देता मार ।
करते कैसे राम फिर ,
उस कुल का उद्धार ।।
(5)
पण्डित बन कर आ गया ,
रावण सबकुछ जान ।
और राम को दे गया ,
विजय-भवी वरदान ।।
(6)
राम शाश्वत चेतना ,
रावण मन का ओज ।
दोनों के पदचिन्ह अब ,
रहा ज़माना खोज ।।
(7)
रावण ने रक्खा सदा ,
सीता का सम्मान ।
अग्निपरीक्षा है मगर ,
नारी का अपमान ।।
(8)
मर्यादा के सूर्य हैं ,
अगर जहां में राम ।
तो हठ-बैरी चाँद है ,
रावण तेरा नाम ।।
(9)
दोनों शिव के भक्त हैं ,
दोनों शिव का नेह ।
दोनों शिव के प्राण हैं ,
दोनों शिव की देह ।।
(10)
रावण नाम घमण्ड का ,
राम विनय का धाम ।
कुल-कलंक रावण हुआ ,
कुल-भूषण हैं राम ।।
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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