उल्हासनगर में पप्पू कालानी का दबदबा

ऋषिकेश राजोरिया 

पूरे देश में जिस महानगर को बंबई कहा जाता हैवह दरअसल छोटी छोटी बस्तियों का विशाल समूह है। कुलाबा से लेकर एक तरफ वसई विरारदूसरी तरफ ठाणे कल्याण। पश्चिम रेलवे की लोकल ट्रेनें चर्चगेट से और मध्य रेलवे की लोकल ट्रेनें वीटी सेजो अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस या सीएसटी कहलाता है। सीएसटी से ही हार्बर लाइन जो पहले चेंबूरमानखुर्द तक चलती थीअब नवी मुंबई तक विस्तारित हो गई है। तीनों लाइनों पर कुल मिलाकर सौ से ज्यादा स्टेशन। हर स्टेशन का वातावरण दूसरे स्टेशन से अलग। दादर की तुलना बांद्रा से नहीं हो सकती। बांद्रा की तुलना अंधेरी से नहीं हो सकती। अंधेरी की तुलना बोरीवली से नहीं हो सकती। मुलुंड का माहौल अलग तो घाटकोपर का माहौल उससे अलग। कहीं उत्तर भारतीय ज्यादाकहीं दक्षिण भारतीय ज्यादाकहीं मराठी लोगों का बाहुल्य तो कहीं गुजरातियों का। विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करते समय बंबई की यह खासियत अच्छी तरह समझ में आई।

ठाणे के बाद कल्याण। कल्याण से दो लाइनें कर्जत और कसारा। कर्जत लाइन पर कल्याण से आगे उल्हासनगर। उल्हासनगर का माहौल पूरे बंबई से अलग थाजहां पप्पू कालानी जेल में रहते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहा था। सुरेश कालानी उर्फ पप्पू का इतिहास उल्लेखनीय है। उल्हासनगर में उसकी हैसियत बेताज बादशाह जैसी थी। वह जेल में था। उसकी पत्नी ज्योति कालानी चुनाव प्रचार का संचालन कर रही थी। मैं बिरजू भाई के कहने से साईं बलराम से मिला। वे एक दरबार के युवा साईं थे। सिंधी समाज में दरबार होते हैंजिसका प्रमुख साईं होता है। साईं को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। सिंधी समाज के लोग साईं के सामने दरबार में मत्था टेकने पहुंचते हैं। आम तौर पर साईं बुजुर्ग और अविवाहित होते हैंलेकिन साईं बलराम युवा और शादीशुदा थे। पप्पू कालानी से उनकी घनिष्ठता थी। उन्होंने मुझे बताया कि उल्हासनगर के पत्रकारों ने टोली बना रखी है और वे पप्पू कालानी के बारे में कोई भी अच्छी खबर नहीं छपने देते हैं। पप्पू का जीतना तय हैफिर भी यहां के स्थानीय संवाददाता उसके नाम से पहले कुख्यात शब्द जोड़ना नहीं भूलते। आप उसके नाम से यह कुख्यात शब्द हटवाइए।

गौरतलब है कि उल्हासनगर में स्थानीय पत्रकारों की टोली प्राण धाबर्डे की अगुवाई में काम करती थी। उल्हासनगर में हर ब्रांड का नकली सामान बनता था। धांधलियों की भरमार थीइसलिए स्थानीय पत्रकारों के सामने कमाई के मौके भी थे। जो पत्रकार नियमित नौकरी नहीं करते हैंस्थानीय स्तर पर उनकी आमदनी इसी तरह होती है। पप्पू कालानी का शराब का कारोबार था। स्थानीय राजनीति पर भी उसकी पकड़ थी। रियल एस्टेट का कारोबार भी था। लेकिन अपने कर्मों से वह जेल पहुंच गया था। उसने सबसे खतरनाक काम यह किया था कि उसने कई प्रभावशाली लोगों के अश्लील कैसेट धोखे से तैयार करवा लिए थे। जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया तो सबसे पहले सीमा रिसोर्ट में तलाशी अभियान चलाया। सीमा रिसोर्ट पप्पू कालानी का ऐशगाह थाजहां कई बड़े अफसर और नेता अय्याशी करने पहुंचते थे। उनकी करतूतें गुप्त कैमरों से दर्ज कर ली जाती थी। पुलिस ने उस सीमा रिसोर्ट पर बुलडोजर चलवाकर उसे मैदान में तब्दील करवा दिया था।

साईं बलराम से बात करने के बाद मैंने उल्हासनगर का सघन दौरा किया। प्राण धाबर्डे से दोस्ती होने के बाद उन्होंने मेरा परिचय वहां के कई लोगों से करवा दिया थाजिनमें दिनेश मालवीयगजराज मीणागुड्डू शर्मा प्रमुख थे। दिनेश मालवीय कल्याण रेलवे स्टेशन पर टीसी थे। गजराज मीणा कस्टम एक्साइज अधिकारी थे और गुड्डू शर्मा एक बेकरी चलाता था। विद्वान लेखक अजातशत्रु भी उल्हासनगर में रहते थे। मैंने उल्हासनगर में कई लोगों से बातचीत की। कांग्रेस और भाजपा शिवसेना के चुनाव कार्यालयों का माहौल देखा। ज्योति कालानी से मुलाकात नहीं हुई।

पूरा माहौल समझने के बाद मैंने जनसत्ता में रिपोर्ट छापी कि उल्हासनगर में कहने के लिए तिकोना मुकाबला हैलेकिन निर्दलीय उम्मीदवार पप्पू कालानी को छोड़कर बाकी उम्मीदवार हथियार डाले हुए हैं। वहां पप्पू कालानी का जीतना तय है। इसी तरह एक अन्य निर्दलीय उम्मीदवार हितेन्द्र ठाकुर का चुनाव प्रचार भी देखाजो वसई से चुनाव लड़ रहे थे। वे कुख्यात गैंगस्टर भाई ठाकुर के भाई थे। हितेन्द्र ठाकुर को हराना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल था। बंबई के दो किनारों पर ये दो निर्दलीय उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में चर्चा का विषय बने हुए थे। हितेन्द्र ठाकुर के साथ मैं कम से कम चार-पांच घंटे क्षेत्र में घूमा था। वह जहां जाते, वहां पूरा गांव उनका स्वागत करने के लिए उमड़ पड़ता था। ऐसा लगता ही नहीं था कि हितेन्द्र ठाकुर के अलावा कोई अन्य उम्मीदवार भी प्रचार कर रहा है।