बोरीवली स्टेशन पर बड़ा पाव
केसी कालेज में हिंदी के प्रोफेसर डॉक्टर शीतला प्रसाद दुबे एलफिंस्टन रोड के पास एक छोटे से चाल नुमा मकान में रहते थे। मकान के पास उनकी मिठाई की दुकान भी थी। राकेश दुबे के साथ कई बार उनके घर जाने का मौका मिलता था। जब जनसत्ता में फीचर पेज संभालता था, तब मैंने शिक्षा पर आधारित उनके लेख भी छापे थे। गायत्री की चेतावनी के बाद जब फ्लैट लेने की जरूरत महसूस हुई थी, तब राकेश दुबे ने उनसे संपर्क करवाया था। उनके सौजन्य से मैं गायत्री और टीटा के साथ भाइंदर में रहने लगा था। हर महीने किराया दे दिया करता था। कोई समस्या नहीं थी, लेकिन शायद राकेश दुबे को समस्या थी। मेरा अपना स्वभाव, उसका अपना स्वभाव, कौन क्या कर सकता है। शीतला प्रसाद दुबे एक दिन कहने लगे कि उनका भाई आने वाला है, उसके लिए फ्लैट की जरूरत रहेगी….. उनको आगे बोलने की जरूरत नहीं थी। मैंने कहा, ठीक है, मैं दूसरा फ्लैट देख लेता हूं।
भाइंदर में स्थानीय लोगों से परिचय हो चुका था। कुछ लोगों से द्विजेन्द्र तिवारी ने परिचय करवा दिया था। जैसे राजनाथ सिंह, उनके माध्यम से महेन्द्र सिंह, अशोक सिंह, भगवान सिंह, विजय सिंह आदि। मैंने उन्हें समस्या बताई तो उन्होंने युद्ध स्तर पर मेरे लिए फ्लैट खोजने का अभियान चलाया और चौबीस घंटे में पड़ोस की इमारत शिवगंगा अपार्टमेंट में पहली मंजिल का फ्लैट खाली मिल गया। वह फ्लैट रिटायर अध्यापक एसके सिंह का था, जो उसी इमारत की तीसरी मंजिल पर रहते थे। फ्लैट बदलने में कोई समस्या नहीं हुई।
राकेश दुबे हैरान था कि ऐसा कैसे हुआ कि मुझे परेशानी नहीं हुई। बंबई में फ्लैट बदलना बड़ी समस्या होती है। फ्लैट बदलने से पहले एक दिन दफ्तर में रात में घनश्याम दुबे का फोन आया था। राकेश दुबे मेरी हर गतिविधियों पर बारीक नजर रखता था। मैं किससे फोन पर बात करता हूं, क्या खबरें बना रहा हूं, कैंटीन में किसके साथ हूं, वगैरह वगैरह। मैंने फोन उठाया, दुबेजी एमएलए होस्टल से बोल रहे थे।
घनश्याम दुबे को मैं दुबेजी कहने लगा था। उन्होंने कहा, मैं घर निकलने वाला हूं, आपकी ड्यूटी कब तक है? मैंने कहा, मैं भी निकलने वाला हूं। उन्होंने कहा, मैं गाड़ी लेकर आ रहा हूं, ओबेराय के सामने रोकूंगा, आप मेरे साथ चलेंगे, अपन सन एंड सैंड में साथ भोजन करेंगे। मैंने कहा, ठीक है और फोन रख दिया। राकेश दुबे को भनक लग गई। पूछने लगा, क्या दुबेजी का फोन था? मैंने कहा, हां, उनके साथ जाना है। वह कहने लगा, यार, फिर तो मैं भी उनकी गाड़ी में बोरीवली तक तुम्हारे साथ चल सकता हूं। मैं क्या कहता?
वह मेरे साथ दुबेजी की गाड़ी तक पहुंच गया। दुबेजी ने मुझे आगे की सीट पर साथ बैठाया, पीछे की सीट पर राकेश दुबे बैठ गया। दुबेजी का शरीर इतना विशालकाय था कि मारुति 800 जैसी कार उनके लिए बहुत छोटी पड़ती थी। इसलिए वे ट्रैक्स गाड़ी का इस्तेमाल करते थे। उनके पास अन्य गाडियां भी थीं। रास्ते में कहने लगे, अब तो रात बहुत हो गई है, भोजन कहां मिलेगा? मैंने कहा, आप पहले बताते तो सरदार पावभाजी वाला है, ग्रांट रोड पर, वहां पावभाजी खा लेते। दुबेजी कहने लगे, वह तो काफी पीछे छूट गया।
बीच-बीच में उन्होंने राकेश दुबे का परिचय प्राप्त किया। दुबेजी उत्तर प्रदेश के और बनारस के आसपास के ही थे। राकेश दुबे ने उन्हें गर्व से बताया कि वह जौनपुर जिले का है। बातचीत के दौरान दुबेजी ने उलाहना दिया कि राजोरियाजी, आप अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन अभी आपको बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। बातचीत करते हुए हम बोरीवली पहुंच गए। दुबेजी ने स्टेशन पर गाड़ी रोकी। मैंने कहा, आइए, मैं आपको प्लेटफार्म पर बड़ा पाव खिलाता हूं। दुबेजी, मैं और राकेश प्लेटफार्म पर पहुंच गए। स्टाल पर गर्म आलूबड़े बन रहे थे। तीनों ने बड़ापाव खाए।
दुबेजी ने कहा, वाह राजोरियाजी, आपके कारण मैं अठारह साल बाद बंबई के किसी रेलवे प्लेटफार्म पर आया हूं। विरार ट्रेन आने के बाद मैं और राकेश दुबे उसमें सवार हो गए। दुबेजी बोरीवली पूर्व में एक बड़े बंगले में रहते थे। राकेश दुबे नालासोपारा में रहने लगा था, जो भाइंदर से आगे वसई के पास है। अगले दिन दुबेजी कहने लगे, आप भी कमाल करते हैं। मुझे आपके साथ गपशप करनी थी, आप उसको साथ क्यों ले आए? मैं इस तरह हर किसी से खुली बातचीत नहीं करता हूं। और वह हमारे इलाके का है। आपमें और उसमें काफी अंतर है।
दुबेजी की बात मुझे समझ में आई। लेकिन मैं राकेश दुबे को मना करने की स्थिति में नहीं था। और दुबेजी उत्तर प्रदेशीय महासंघ के प्रमुख थे, शिवसेना की तरफ से विधान परिषद सदस्य थे, नेता थे। वे मेरे साथ पहुंच गए व्यक्ति को क्यों मना करते? इस तरह एक खास तरह की आलीशान पार्टी का संयोग राकेश दुबे की वजह से टल गया था। संगति के प्रभाव से जीवन में कई तरह के अच्छे बुरे परिवर्तन आते हैं, यह ज्ञान तब मुझे नहीं था, लेकिन अनुभव हो जाने के बाद अब मैं इसे लिखने की स्थिति में हूं।

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