अन्धे के आगे रोये थे

ढूँढ रहे हैं अपनी आँखें


अपनी करनी पार उतरनी

अधजल गगरी छलकी जाती

एक म्यान में दो तलवारें

खिसियानी बिल्ली गुर्राती

गुरु गुड़ हैं चेले शक्कर हैं

चींटी के निकली हैं पाँखें


है चिराग़ के तले अँधेरा

चोर-चोर मौसेरे भाई

छोटे मुँह से बड़ी बात है

उथले पानी की गहराई

पोल ढोल की देख रही है

बकरे की माँ अब रोज़ सलाँखें


तीर नहीं तुक्के का चक्कर

भई गति साँप छछून्दर जैसी

मुख में राम बगल में छुरियाँ

लकड़ी के बल बन्दर जैसी

हाथ सुमरिनी बगल कतरनी

खुजलाते अपनी ही काँखें

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'