शिवसेना भवन के सामने धरना
ऋषिकेश राजोरिया
जीवन में गुजरे हुए घटनाक्रम को याद करते समय कई लोग याद आते हैं, किसने अपने साथ क्या किया, ये बातें भी साफ होती हैं। ज्यादातर लोग जो कुछ भी करते हैं, वे अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। मैंने जो अनुभव लिखे हैं, उसमें कुछ लोगों को बुरा लग सकता है, इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं। जो भी घटनाएं हुई हैं, उनका कारण मैं नहीं हूं। किसी भी घटना के पीछे कई लोगों की भूमिका होती है। घटनाक्रम हो जाने के बाद उसका पुनरावलोकन करने पर कई हैरतअंगेज बातें सामने आती हैं। क्यों, कैसे, किसने, क्या इरादा था, वगैरह-वगैरह तमाम सवाल उठने लगते हैं।
बंबई में दंगे हुए, पुलिस ने सख्ती से रोके तो उसकी आलोचना हुई। दूसरी बार दंगे हुए तो पुलिस ने सख्ती नहीं की। तब जो कुछ हुआ, वह एक भयानक इतिहास है। राहुल देव को लगा कि दंगों की जिम्मेदार सिर्फ शिवसेना है। मैं जो कुछ जमीन पर देखता था, उसके आधार पर अपनी राय बनाता था। दक्षिणपंथ का उभार पूरी दुनिया में देखा जा रहा था। भारत भी उससे अछूता नहीं रह सकता था। कांग्रेस मध्यमार्गी पार्टी थी और उस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगने लगे थे। उस समय बातचीत के दौरान सदानंद गोडबोले कहते थे कि भविष्य में बहुजन समाज पार्टी उभरने वाली है। उसके लिए कांशीराम बहुत मेहनत कर रहे थे। बंबई में दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में शिवसेना को जनता का भारी समर्थन था। उत्तर भारतीय समाज शिवसेना का वोट बैंक कभी नहीं रहा।
राहुल देव ने एक तरफ उत्तर भारतीय नेताओं से मेलजोल बढ़ाया, दूसरी तरफ पत्रकारों की तरफ से शिवसेना के खिलाफ मोर्चा खोला। अखबार में खबर छप ही चुकी थी कि पत्रकारों के कार्यक्रम में शिवसैनिकों ने जानलेवा हमला किया था। उसके खिलाफ पूरे देश के पत्रकार एकजुट हुए और एक दिन दादर में शिवसेना भवन के सामने विरोध में धरना दे दिया। इस धरने की पटकथा राहुल देव ने तैयार की थी। बाद में इसका श्रेय उन्होंने प्रभाष जोशी को दे दिया।
उस धरने में प्रभाष जोशी के अलावा निखिल चक्रवर्ती (अब दिवंगत), एन राम, मृणाल पांडे, दिलीप पाडगांवकर, राजदीप सरदेसाई, शबाना आजमी, हरि जयसिंह, विश्वनाथ सचदेव, निदा फाजली, पंडित जसराज, डॉली ठाकुर, राज बब्बर, एलिक पदमसी सहित कई गणमान्य लोग शामिल हुए। सभी शिवसेना भवन के सामने टेंट लगाकर धरना दे रहे थे। टेंट को चारों ओर से करीब तीन हजार शिवसैनिकों ने घेरा हुआ था। वे बाला साहेब के इशारे का इंतजार कर रहे थे।
बाल ठाकरे शिवसेना भवन में थे। उन्होंने मनोहर जोशी की अगुवाई में प्रतिनिधि मंडल धरना दे रहे लोगों से बात करने के लिए भेजा। धरना समाप्त करने के लिए कोई तैयार नहीं था। मनोहर जोशी के लौटने के बाद बाल ठाकरे ने खिड़की से दर्शन दिए। शिवसैनिकों को हाथ से इशारा करके लौटने को कहा। साथ ही बयान दिया कि ये लोग बड़े-बड़े पत्रकार हैं। देशभर से आए हैं। इनको कुछ गलतफहमी हो गई है, इसलिए धरना दे रहे हैं, शाम तक यहां बैठेंगे फिर चले जाएंगे। हमें कोई एतराज नहीं है।
मैं उस धरने में जानबूझकर नहीं गया था, क्योंकि वह मुझे राजनीतिक स्टंट जैसा मालूम पड़ता था, जिसकी चपेट में प्रभाष जोशी, निखिल चक्रवर्ती, एन राम जैसे पत्रकार भी आ गए थे। शिवसेना का विरोध ही करना था तो खबरों के स्तर पर, विचारों के स्तर पर उसकी प्रखर आलोचना करने से किसी ने नहीं रोका था। पत्रकारों का यह धर्म है। लेकिन बंबई में बात धरना, प्रदर्शन और खबर मैनेज करने तक पहुंच गई थी। धरना स्थल का पूरा हाल मुझे राकेश श्रीमाल ने बताया। अच्छा था या बुरा था, सबके अपने-अपने दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन यह बात मेरे गले उतरने वाली नहीं थी। मुझे इस घटनाक्रम के साफ विरोध में देखकर राहुल देव ने दफ्तर में मेरी जगह राकेश दुबे का प्रमोशन करने का फैसला किया।


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