गाँधी
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देश आज़ाद हो चुका था । लेकिन साम्प्रदायिक दंगों ने पूरे देश को लील रखा था ।
गाँधी कलकत्ता में आमरण अनशन पर बैठे हुए थे । अनशन को 6 दिन हो रहे थे । उनके प्रभाव के कारण धीरे-धीरे शांति स्थापित हो रही थी ।
6ठे दिन की शाम का दृश्य यह था कि गाँधी खाट पर लेटे थे । पटेल , नेहरू , मौलाना सहित लगभग सभी बड़े नेता गाँधी के बिस्तर को घेरे बैठे थे । पण्डित नेहरू बोले "आज कहीं से कोई मारकाट की ख़बर नहीं है , हिन्दू-मुसलमान हालात को समझ रहे हैं , दंगे रुक गये हैं , अब ये अनशन तोड़ दीजिये बापू ।" सभी नेता नेहरू जी की बात का समर्थन करते हैं । पटेल ज़ोर देकर अनशन तोड़ देने का निवेदन करते हैं ।
सबकी बात सुनकर उस डेढ़ पसली कंकाली-काया के मुख पर एक हल्की सी मुस्कुराहट आती है । बापू पटेल और नेहरू का हाथ अपने दोनों हाथों में लेते हैं और फिर धीरे से फुसफुसाते हुए बोलते हैं "इतना काफ़ी नहीं है जवाहर , अभी इन दोनों(हिन्दू-मुसलमान) को गले भी मिलना पड़ेगा ।"
ये थे थ्री पीस सूट पहनने वाले , हैट लगाने वाले , सिगार पीने वाले और अपना पूरा नाम "बैरिस्टर मोहन दास करमचंद गाँधी" लिखने वाले से सबकुछ छोड़ कर महात्मा में तब्दील हो जाने वाले बापू ।
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'


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