क़ाफ़ियापैमाई करने से कहाँ होती ग़ज़ल 

शेरियत ही जब नहीं तो फिर भला कैसी ग़ज़ल 


अब फ़क़त महबूब से बातें नहीं करती है ये 

हर मसाईल है नुमायां देख लो अब की ग़ज़ल 


मीर हैं बाबा जो इसके तो हैं ग़ालिब भी चचा 

इन बुज़ुर्गों की दुआओं से ही तो पनपी ग़ज़ल 


मर्सिया पढ़ते हैं जब भी तो ये लगता है अनीस 

कर्बला की दास्तां को ख़ून से लिखती ग़ज़ल 


जब बढ़ा इक़बाल तो फिर ये भी देखा है यहाँ 

मुल्क का क़ौमी तराना झूम कर गाती ग़ज़ल 


हो अगर दिलकश तरन्नुम तो ये जादू सा करे 

वरना तहतुललफ़्ज़ में भी ख़ूब है भाती ग़ज़ल 


कितनी शुहरत कितनी दौलत है गुलुकारों के नाम 

कहने वालों की मगर गुमनाम रह जाती ग़ज़ल 


कल ये उलझी थी गुलो-बुलबुल में साक़ी-जाम में 

कौन सा पहलू है जिसको अब नहीं कहती ग़ज़ल 


ज़िन्दग़ी का हर दरीचा इसमें रौशन है मगर 

बात अब भी हो तग़ज़्ज़ुल की तो छा जाती ग़ज़ल 


लोग क़िर्तासो-क़लम ले सोचते ही रह गये 

जो तेरे लब से हुई आख़िर वही ठहरी ग़ज़ल


बाअसर होती ही तब ही जब हो उर्दू का मिज़ाज

यूँ यहाँ कहते हैं कितने देखिये हिन्दी ग़ज़ल


क्या पता इलहाम 'साहिल' से ही क्यों नाराज़ है 

आज तक तो हो न पायी एक भी अच्छी ग़ज़ल 

©️✍ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'