दूब 

तुम भी हो

दूब 

हम भी हैं

किन्तु 

कितना फ़र्क़ है

हम दोनों में 

तुम हो

किसी लॉन में लगी

वो दूब 

जिसे बाक़ायदा

लगाया गया

और

कतरा गया 

समय-समय पर

जिसे मिला 

खाद-पानी

जिसे बचाया गया

बहुत घनी छाँव

और

बहुत तेज़ धूप से

जिसने पाया

एक गढ़ा हुआ

आकार

और हम

उगे 

किसी जंगल में

किसी वीराने में

किसी मुँडेर पर

किसी काई में

और हो गये

बेतरतीब

और 

पता नही क्यों

हो गये 

हमारे सिरे 

तीखे और नुकीले

ऐसा नहीं 

कि हमने 

कोशिश नहीं की

किसी सुन्दर 

लॉन में 

उगने की

उगे भी

लेकिन

उखाड़ दिये गये

उगते ही !

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'