यार माँगी थी मदद तुम

मश्विरा देने लगे


थी बहुत उम्मीद तुमसे

बस वही लेकर है आई

क्या पता था तुम करोगे

यूँ हमारी जगहँसाई

तोड़ कर रिश्तों की हद तुम

पाठ सा देने लगे


भूल बैठे हो कभी तुम

थे इसी साँसत तले ख़ुद

और तुमको उस समय पर

हम लगाते थे गले ख़ुद

भूल कर ख़ुद का वो क़द तुम

हीनता देने लगे


वक़्त का ही खेल है सब

वक़्त की ही बात है

दिन कहाँ अब दिन सरीखे

रात ही कब रात है

हाँ मगर खलता ये मद तुम

फ़ैसला देने लगे

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'