गायत्री का बंबई आगमन
ऋषिकेश राजोरिया
अयोध्या का घटनाक्रम पूरे देश को काफी हद तक झकझोर गया था। उसके बाद जो दंगे हुए, खास तौर से बंबई में, उसने पूरी सामाजिक तस्वीर उलट-पलट कर दी थी। दंगों के दौरान दफ्तर में काफी व्यस्त रहना पड़ता। सबसे ज्यादा मेहनत विवेक अग्रवाल को करनी पड़ती थी, क्योंकि वह क्राइम रिपोर्टर था। विवेक ने उस एक महीने के दौरान जितनी मेहनत की थी, उतनी उसने जिंदगी में कभी नहीं की होगी। दफ्तर में एक फोन उसी के पास रहता था। उसके रहते जनसत्ता में दंगों की रिपोर्टिंग अन्य अखबारों से उन्नीस नहीं होती थी। इसके बावजूद उसे पूर्णकालिक संवाददाता नियुक्त नहीं किया गया था। उसे एक अलग वाउचर पर नाममात्र का पारिश्रमिक दिया जाता था।
वाउचर पर काम करने वाले कुछ अन्य लोगों में सुमन थी, शैलेन्द्र श्रीवास्तव था, जो बाद में मध्य रेलवे में टीटी बन गया। दंगों के दौरान तमाम खबरें ऐसी आती थीं, जिनको पुष्टि किए बगैर नहीं छापा जा सकता था। कई तरह की अफवाहें उड़ती थीं। एक बार खबर आई कि कुछ लोगों ने एक सब इंस्पेक्टर की गरदन काटकर उसका सिर थाली में रखकर जुलूस निकाला। इस तरह की बेसिरपैर की कई खबरें आती थीं। छापने से पहले बहुत ध्यान रखना पड़ता था।
दंगों के दौरान बंबई में कारोबार की हालत खराब हो गई थी। खास तौर से फिल्म उद्योग का काम जैसे ठप पड़ गया था। दंगों के लिए शिवसेना को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू हो चुका था। हिंदी भाषी समुदाय में बढ़ती आलोचना के मद्देनजर शिवसेना ने 23 फरवरी 1993 को सामना का हिंदी संस्करण - दोपहर का सामना - सांध्यकालीन अखबार के रूप में शुरू कर दिया । संजय निरुपम जनसत्ता छोड़कर दोपहर का सामना के संपादक बन गए थे। उनके जनसत्ता छोड़ने से पहले ही रेखा देशपांडे ने जनसत्ता में काम करना शुरू कर दिया था। दंगे शांत होने के बाद बंबई फिर अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करने लगा। उस समय मंत्रालय के पास विशाल गांधी प्रतिमा के नीचे फिल्म जगत के लोगों ने धरना दिया था।
मैं दफ्तर तक जाने-आने के दौरान कुछ समय उस जगह गुजारता था। वहां मैंने सुभाष घई और अनुपम खेर से बहुत देर बातचीत की थी और मिथुन चक्रवर्ती, आमिर खान सहित कई कलाकारों को धरने में देखा था। एक बार रात में करीब 12 बजे लौटते समय वहां देखा तो रूपेश कुमार और संजय दत्त मौजूद थे। संजय दत्त मार्लबोरो सिगरेट पी रहे थे। मैंने कहा, गांधी प्रतिमा के नीचे सिगरेट। संजय दत्त ने हंसते हुए कहा, तुम पत्रकार लोग भी बात का बतंगड़ बनाने का मौका ढूंढ़ते रहते हो। उस समय एक कलाकार के साथ वहां तब्बू पहुंची थी, जो तब फिल्मों में नहीं आई थी। इस घटनाक्रम के दौरान ही मेरा रहने का ठिकाना बदल गया। मैं गायत्री और टीटा (छोटे पुत्र सुशांत का घर का नाम) के साथ भाईंदर में रहने लगा।
बंबई में परिवार के साथ रहना था, इसलिए इंदौर से गायत्री और टीटू को साथ लेकर आ गया था। भाइंदर जाने से पहले होस्टल जाने का विचार किया। बंबई सेंट्रल से चर्चगेट की लोकल ट्रेन में चढ़ते समय अच्छी-खासी भीड़ थी। मैंने गायत्री को ट्रेन में चढ़ा दिया, टीटा उसकी गोद में था। उसके पीछे मैं ट्रेन में चढ़ने वाला था, इतने में ट्रेन चल दी। मैं प्लेटफार्म पर खड़ा रह गया। ट्रेन आगे निकल गई। मुझे आसमान घूमता हुआ नजर आने लगा।
मैं दूसरी ट्रेन से चर्चगेट पहुंचा, तब गायत्री ट्रेन के लेडीज कोच में सवार दिखी। वह टीटा के साथ लेडीज कोच में सवार हो गई थी। परेशान थी। मुझे देखकर उसकी परेशानी दूर हुई और मेरी भी जान में जान आई। अगर वह ट्रेन मेरे पहुंचने से पहले चल दी होती तो क्या होता……. सोचकर आज भी कंपकंपी आ जाती है। हम होस्टल चले गए। भरत और राजेन्द्र ने स्वागत किया। मेरे छोटे बेटे टीटा के साथ मिलकर सभी खुश हो रहे थे, जो तब बोलना सीख रहा था। सलिल सुधाकर ने भी उससे बात करने की कोशिश की। उसका नाम मैंने सुशांत रखा था। बड़े बेटे का नाम तन्मय, छोटे बेटे का नाम सुशांत।
तन्मय उर्फ ताना इंदौर में ही दादा-दादी और चाचाओं के पास रह गया था। उन्होंने ही आग्रहपूर्वक उसे रोका था कि ताना को यहीं रहने दो। होस्टल में हमने रात गुजारी। अगले दिन गेट वे आफ इंडिया के पास सैर सपाटा किया, मरीन ड्राइव पर घूमे। गायत्री को एक्सप्रेस टावर ले जाकर दफ्तर दिखाया। राहुल देव से मिलवाया। उन्होंने टीटा को चाकलेट दी। इसके बाद हम भाइंदर चले गए। होस्टल में भरत, राजेन्द्र के साथ रहने का सिलसिला खत्म हो गया। मेरे पास पैसे नहीं थे, फिर भी मैं फ्लैट में रहने लायक स्थिति इसलिए बनी कि कुछ मित्रों ने आर्थिक मदद की थी।
भरत और राजेन्द्र ने तो पैसे दिए ही थे, बिरजू भाई ने ढाई हजार रुपए दिए। प्रेम शुक्ल ने ढाई हजार रुपए दिए। कुछ मदद राहुल देव ने की। मेरे भाई स्वदेश का एक मित्र कृष्णेश बाजपेई भाइंदर में रहता था। उसने तीन हजार रुपए दिए। इस तरह भाइंदर में मेरा घर बस गया। ज्यादातर लोगों के पैसे मैंने लौटा दिए थे, लेकिन राजेन्द्र के सात सौ रुपए अभी भी बाकी है। इसके साथ ही एक नई तरह की जिंदगी शुरू हुई। लोकल ट्रेन से रोजाना 45 किलोमीटर का अप-डाउन। रोजाना चार-पांच बजे 45 किलोमीटर भाइंदर से चर्चगेट तक जाना और उसी रास्ते रात में करीब दो बजे तक लौटना। जाते समय अकेले, लौटते समय चार-पांच लोगों का साथ। ड्यूटी पूरी करने के बाद दफ्तर से चर्चगेट पहुंचने पर 12.15 या 12.40 बजे की लोकल ट्रेन मिलती थी, जो डेढ़-दो बजे तक भाइंदर पहुंच जाती थी। भाइंदर स्टेशन से शेयर आटोरिक्शा में तीन रुपए देकर घर तक पहुंचना होता था।


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