जनसत्ता बंबई में नियुक्ति
ऋषिकेश राजोरियाबंबई जाते समय जीवन की पिछली तस्वीरें याद आने लगीं। एक बार मैं भागकर मुंबई पहुंचा था। इस बार माता पिता के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लेकर रवाना हुआ था। उस समय मेरे पास कुछ नहीं था। इस बार अटैची साथ में थी और काफी सामान भी था। तब कोई मंजिल नहीं थी। इस बार मंजिल स्पष्ट थी कि कहां पहुंचना है। नईदुनिया का कार्यकाल याद आने लगा। वहां बहुत कुछ सीखा था। खास तौर से प्रभु दा से। राहुल बारपुते से। अभयजी से। और भी तमाम साथियों से समय समय पर बहुत कुछ सीखने को मिला। पत्रकारिता में भाषा का उपयोग किस प्रकार होता है, इसका बेहतरीन प्रशिक्षण नईदुनिया में मिलता था। उसकी नींव राजेन्द्र माथुर ने मजबूत की थी, जो नवभारत टाइम्स में चले गए थे। मुझे उनके साथ काम करने का मौका नहीं मिला। उनके बाद देश के दूसरे बड़े पत्रकार लेखक जनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी थे। वे भी इंदौर के थे और कभी नईदुनिया में काम कर चुके थे। उनकी अगुवाई में जनसत्ता देश के हिंदी पत्रकारों के लिए सितारा दर्जे का अखबार बन चुका था।
सरल और बोलचाल की भाषा में खबरें प्रस्तुत करना जनसत्ता की खूबी थी। और मैं प्रभाष जोशी की लेखनी का प्रशंसक था और उनकी अगुवाई में ही अगली पारी शुरू करने जा रहा था। मैं बंबई पहुंचकर सबसे पहले बिपिन भाई के पास पहुंचा, यह सोचकर कि वे कहीं ठहरने की व्यवस्था करवा देंगे। उन्होंने डोंबिवली में एक निर्माणाधीन इमारत में रहने की व्यवस्था कर दी। वहां उनके दो तीन भाई बंधु भी रहते थे। वहां सामान रखकर लोकल ट्रेन से दादर पहुंचा। वहां से ट्रेन बदलकर चर्चगेट फिर पैदल नरीमन पाइंट पहुंचा, जहां एक्सप्रेस टावर नामक 25 मंजिला इमारत है। उसके एक तरफ एयर इंडिया की गगनचुंबी इमारत है और दूसरी तरफ सड़क पार ओबेराय टावर्स है। ये तीनों गगनचुंबी इमारतें बंबई में नरीमन पाइंट की खास पहचान है और मरीन ड्राइव पर दूर से दिखती है।
जनसत्ता के स्थानीय संपादक राहुल देव का व्यक्तित्व शानदार था। उनसे मिलने के बाद पक्का हो गया कि मुझे वहीं उप संपादक के रूप में काम करना है। करीब एक हफ्ता काम करने के बाद मुझे वापस इंदौर लौटना पड़ा, क्योंकि नईदुनिया से कार्यमुक्त होने का प्रमाण पत्र लेना जरूरी था। इसी दौरान मेरे यहां दूसरी संतान के जन्म की परिस्थितियां भी बन गई थी। मेरे बंबई जाने से परिवार के लोग उत्साहित थे। बंबई से लौटकर करीब दस दिन बाद मैंने अभयजी को फोन कर दफ्तर में आने की अनुमति मांगी। जब मैं पहुंचा तो अभयजी ने बहुत अच्छा व्यवहार किया। सामने कुर्सी पर बैठाया। चाय पिलाई। प्रमुख एकाउंट अधिकारी पुरोहितजी से कहा कि इनका हिसाब करके सर्टिफिकेट बना दो। यह काम आधा घंटे में हो जाना चाहिए।
मैं पुरोहितजी के पास पहुंचा तो उन्होंने वह इस्तीफा दिखाया, जो मैंने जनसत्ता के दफ्तर में टाइप करके डाक से भेज दिया था। उन्होंने कहा, आपने इस पर दस्तखत नहीं किए हैं, इसलिए इसे कैसे मंजूर किया जाए? बात सही थी। मैंने बगैर दस्तखत किए टाइप किया हुआ कागज भेज दिया था। मैंने उनके सामने दस्तखत कर दिए। उन्होंने मेरा हिसाब कर दिया। कार्यमुक्त होने का प्रमाण पत्र दे दिया। अच्छे खासे पैसे मिले। एक दो दिन बाद मैं फिर बंबई में था। समाचार डेस्क पर काम करने लगा। सदानंद गोडबोले, गणेश झा, सतीश पेडणेकर, ओम प्रकाश सिंह, सरोज कुमार मिश्रा, प्राण धाबर्डे, इंद्रकुमार जैन, चंदर मिश्रा सहित करीब 15 लोग संपादकीय विभाग में थे।
एचआर विभाग को मैंने कागजात सौंपे तो उन्होंने कहा कि आपका नियुक्ति पत्र एक जनवरी से बनेगा। एक जनवरी 1991 की तारीख से मुझे नियुक्ति पत्र मिला। उसी दिन घर से स्वदेश का टेलीग्राम आया, पुत्र जन्म और नववर्ष की एकसाथ बधाई। पहले पुत्र ताना का जन्म हुआ था तो मैं तत्काल अस्पताल पहुंचा था, बेटे को देखा था। दूसरे पुत्र का जन्म हुआ तब मैं गैरहाजिर था। बंबई में था। एक्सप्रेस टावर की दूसरी मंजिल पर जहां दफ्तर था, वहां सामने खिड़की से ओबेराय होटल का स्वीमिंग पूल दिखता था।
संपादकीय विभाग की जैसी व्यवस्था इंदौर में नईदुनिया में थी, वैसी व्यवस्था यहां नहीं थी। यहां आधे से ज्यादा सामग्री मोडम से दिल्ली से पहुंचती थी। उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सिर्फ पेज पर चिपकाना होता था। ज्यादातर खबरें लोकल ही बनती थीं। राष्ट्रीय स्तर की खबरें दिल्ली से आ जाती थी। संपादकीय पेज की सामग्री भी दिल्ली से मिलती थी। यहां सिर्फ पत्र संपादक के नाम बदले जाते थे। इंदोर में मैंने शिव अनुराग पटैरया से जनसत्ता बंबई का हालचाल पूछा था, जब वे जनसत्ता छोड़कर आए थे। उन्होंने कहा था कि भारी अराजकता है, जिसका वर्णन नहीं कर सकते। मैंने बंबई जाकर देखा तो उनकी बात एक हद तक सही थी। बंबई में हिंदी का ज्यादा महत्व नहीं था। पहले नंबर की भाषा मराठी, दूसरे नंबर की भाषा गुजराती, फिर अंग्रेजी और चौथे नंबर पर हिंदी। हालांकि बंबई में घूमो फिरो तो ज्यादातर लोग हिंदी में या मराठी में बोलते, बातचीत करते नजर आते थे। लेकिन इतने बड़े शहर में नवभारत टाइम्स और जनसत्ता को छोड़कर न तो कोई ढंग का हिंदी अखबार था और न ही हिंदी को बढ़ावा देने का माहौल। यह बात अलग है कि हिंदी को सबसे ज्यादा बढ़ावा देने वाला फिल्म जगत बंबई में ही था।
जनसत्ता में शाम 6 बजे से 12 बजे तक ड्यूटी थी। डोंबिवली पूर्व में एक निर्माणाधीन इमारत में रहने की जगह थी। मैं शाम को चार साढ़े चार बजे लोकल ट्रेन में सवार होता। दादर में ट्रेन बदलता। वेस्टर्न लाइन की लोकल से चर्चगेट पहुंचता। वहां से पैदल एक्सप्रेस टॉवर पहुंच जाता। काम वही, एजेंसियों की खबरें बनाना, जो मैं पहले नवभारत में कर चुका था। वहां हम लोग जो खबरें बनाते थे, वे ज्यादातर छाप नहीं पाते थे, क्योंकि सारा मैटर दिल्ली से मोडम के जरिए आ जाता था। ज्यादातर दिल्ली में लिखी गई खबरें ही छपती थीं।
एक दिन पता चला कि चंद्रशेखर बंबई आ रहे हैं। चर्चगेट के पास रिट्ज होटल में उनकी प्रेस कांफ्रेंस थी। वह चर्चगेट से एक्सप्रेस टॉवर जाते समय रास्ते में ही था। मैं डोंबिवली से चर्चगेट पहुंचा और दफ्तर पहुंचने से पहले रिट्ज होटल पहुंच गया। जनसत्ता के चीफ रिपोर्टर दीपक पाचपोर वहां मौजूद थे। उन्हें प्रधानमंत्री के कार्यक्रम की खबर लिखनी थी। हाल में पत्रकारों के बीच पीछे की तरफ मैं भी बैठ गया। चंद्रशेखर ने पत्रकारों के सामने अपना वक्तव्य रखा। फिर पत्रकार सवाल पूछने लगे। कोई पूछ रहा था कि आप कब तक प्रधानमंत्री रहेंगे? किसी ने पूछा, आप कैसे सरकार चलाएंगे? दीपक पाचपोर ने पूछा, आप प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे? इस पर चंद्रशेखर का जवाब था कि आपको नौकरी से निकाल दिया जाए तो आप क्या करेंगे?
वहीं मुझे देखकर उनकी नजरें अटक गईं और वे पूछने लगे, तुम यहां क्या कर रहे हो? पास बैठी एक महिला पत्रकार हैरान हुई, कहा, मिस्टर प्राइम मिनिस्टर नोज यू बाई योर नेम। प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद मैं चंद्रशेखर के पास पहुंचा। उन्होंने कंधे पर हाथ रखा। मैंने बताया कि जनसत्ता में उप संपादक बन गया हूं। उन्हें आश्चर्य हुआ, उलाहना दिया, बताया क्यों नहीं। मैं उनके साथ होटल के कमरे में पहुंच गया। चाय पी। विदा लेकर दफ्तर पहुंच गया। अच्छा लगा। दीपक पाचपोर को भी हैरानी हुई होगी। प्रधानमंत्री के साथ किसी की घनिष्ठता हो तो महत्व बढ़ जाता है। वही मेरे साथ हो रहा था। मुझे अच्छा लगता था।
कुछ दिनों के बाद मैं दो-तीन दिन के लिए दिल्ली गया। भोंडसी पहुंचा। दोपहर का समय था। गेट पर उमेश चतुर्वेदी का कमरा था। उसने सुरक्षा कर्मियों को मुझे जाने देने के लिए कहा। मैं उस झोपड़ी में पहुंच गया, जहां चंद्रशेखर विश्राम कर रहे थे। बाहर के कमरे में माधवजी थे। उन्होंने कहा, तुम भी कुछ देर आराम कर लो। मैं भी वहां लेट गया। करीब चार बजे चंद्रशेखर बाहर निकले। मैंने अभिवादन किया। चंद्रशेखर, माधवजी और मैं, तीनों कुर्सी पर बैठ गए। एक सेवक फ्रिज में से तीन छोटी कांच की बोतलें लाया, जिनमें केरी का पना भरा हुआ था।
चंद्रशेखर ने कहा, यहां सेंटर पर अपन ने जो आम लगाए थे, उनमें केरियां लगने लगी हैं, ये उनका पना है। मैंने उन्हें जनसत्ता का आइडेंटिटी कार्ड दिखाया, गायत्री की और ताना की तस्वीरें दिखाईं। माधवजी ने तस्वीर देखकर हंसी उड़ाई, कहा, फोटो में तुम्हारी पत्नी बूढ़ी दिख रही है। चंद्रशेखर भी हंस दिए, मेरे आइडेंटिटी कार्ड को ध्यान से देखा। उस पर टेंपरेरी लिखा था। देखकर पूछा, अभी टेंपरेरी हो? मैंने कहा, हां, तीन महीने का प्रोबेशन पीरियड है। उन्होंने कल्पना परूलेकर के बारे में पूछा, जो पदयात्रा में थी। मैंने कहा, उज्जैन में होगी। और भी बातें हुईं और मैं बंबई लौट आया। मैं उनसे सिर्फ मिलने और अपना हालचाल बताने गया था।
जनसत्ता के दफ्तर में साथ में काम करने वालों से घनिष्ठता बढ़ने लगी थी। सबसे पहले प्राण धाबर्डे और राजू गायकवाड़ से घनिष्ठता बढ़ी, क्योंकि रात में लोकल ट्रेन से हम साथ ही सफर करते थे। मैं डोंबिवली उतर जाता और वे कल्याण से भी आगे उल्हासनगर तक जाते थे। कुछ दिन यह सिलसिला चलता रहा। रात करीब 2-3 बजे कमरे पर पहुंचकर सो जाता। सुबह करीब 9-10 बजे नीचे मोटर चालू करके खुले में स्नान करना पड़ता। रसोइघर नहीं था, इसलिए चाय की दुकान पर चाय पीता। तैयार होकर डोंबिवली पश्चिम में बिपिन भाई के दफ्तर में पहुंच जाता। वहां समय कटता। दोपहर को एक रेस्तरां में खाने की बंदी लगा ली थी। वहां खाना खा लेता और चार साढ़े चार बजे लोकल ट्रेन से चर्चगेट के लिए रवाना हो जाता। शाम का भोजन दफ्तर के कैंटीन में करता था। इंडियन एक्सप्रेस के कैंटीन में कर्मचारियों को रियायती दरों पर भोजन मिलता था। सिर्फ डेढ़ रुपए में। दो तीन महीनों के बाद दफ्तर पहली मंजिल पर आ गया था। कोई समस्या नहीं थी। काम ठीक चल रहा था। लेकिन कब क्या हो जाए,


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