सुनो

तुम्हें याद है

वो 

रास्ता

जो 

मिला था हमें

बहुत भटकने

के बाद

कितना 

ख़ुश हुए थे

हम 

उसे पाकर

लेकिन 

फिर उस पर

थोड़ा सा ही दूर

चलने के बाद

याद 

आने लगी थी

हमें

वही भटकन

आज भी

हम 

चल तो रहे हैं

अपने-अपने 

रास्ते पर

लेकिन

दिल में

कहीं छुपी है

एक ख़्वाहिश 

फिर से 

भटकने की

पर 

अकेले नहीं 

एक-दूसरे के साथ 

और

यह उम्मीद भी

कि 

नहीं मिले हमें

इस बार 

कोई भी 

रास्ता !

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'