दिल के इन टूटे दियों को वो ज़िया मिलती रहे

जिससे ग़म की तीरगी बस ग़मज़दा मिलती रहे


लोग मज़हब के लिये हरगिज़ न आपस में लड़ें

मुल्क को अम्नो-अमां की ये हवा मिलती रहे


जी न पाया चैन से मैं इन दवाओं के सबब

चैन से मरने की बस अब तो दुआ मिलती रहे


सामने रक्खे बिठा कर तू मुझे कुछ इस तरह

मैं कहूँ मेरे ख़ुदा बस ये सज़ा मिलती रहे 


ज़िन्दगी का हर तलातुम बेअसर हो जायेगा

तेरे आँचल की अगर मुझको हवा मिलती रहे


नक़्शे-पा तो अब किसी के क्या मिलेंगे हाँ मगर

कोई तो ऐसा हो जिसकी ख़ाके-पा मिलती रहे


है दुआ ये ही कि दरिया प्यास से हारे नहीं

और 'साहिल' को भी लहरों की वफ़ा मिलती रहे

©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'