(1)

जीवन भर खलती रही , 

हमको तो यह बात ।

जुगनू के बलिदान को ,

कब समझेगी रात ।।

(2)

हम जुगनू की ज़ात हैं ,

हम हैं नहीं मुफ़ीद ।

ध्रुवतारों की भीड़ में ,

क्या हमसे उम्मीद ।।

(3)

गीत-ग़ज़ल के हो गये ,

अवरोही आलाप ।

जुगनू अकड़े फिर रहे ,

सूरज हैं चुपचाप ।।