राम स्वप्न में आये थे कल
मैं भी उनसे पूछ ही बैठा
कौन हूँ मेरा क्या परिचय है
रघुवर हल्का सा मुस्काये
बोले क्यों ये प्रश्न सताये
तीन प्रहर की उम्र बिताली
क्यों इतना लगते हो खाली
असमंजस है या है शंका
इस सवाल का क्या आशय है
मैं बोला मैं शंकित भी हूँ
असमंजस से अंकित भी हूँ
दोनों ने मुझको है घेरा
प्रश्न हुआ है बहुत घनेरा
जो हूँ क्या वो ही हूँ दिखता
मेरे मन में यह संशय है
राघव ने करुणा दिखलाई
धीर स्वरों में दिया सुनाई
तुम भी मेरे ही बेटे हो
लेकिन कर्मों के हेटे हो
इन कर्मों को भाग्य न समझो
इन सब में दिखता विनिमय है
मैं बोला विनिमय क्या मतलब
समझ न पाता हूँ मैं यह सब
यदि मैं भी हूँ पुत्र तुम्हारा
तो क्यों लगता हूँ बेचारा
क्यों मेरा हर कर्म भाग्य के
हाथों में मेरा संचय है
हँसे राम भी इस उत्तर पर
बोले करते हो विषयांतर
जो विवेक था पास तुम्हारे
उसने ही सब कर्म सकारे
सुनो बताता हूँ मैं तुमको
जो मेरा पक्का निश्चय है
कथनी-करनी अलग तुम्हारी
काँटों में रख दी फुलवारी
मैं-मैं करते उम्र बिता दी
ख़ुद पर ही दुनिया बिसरा दी
बुद्धि लगाते हो भावों में
यही तुम्हारा अब परिचय है
©️✍ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'


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