और जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने
ऋषिकेश राजोरिया
10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इससे पहले उन्होंने जनता दल छोड़ दिया था और समाजवादी जनता पार्टी बनाई थी। उन्हें 64 सांसदों ने समर्थन दिया था। उस समय कांग्रेस चुनाव नहीं चाहती थी, इसलिए उसने चंद्रशेखर की सरकार को बाहर से समर्थन दे दिया था। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने पर मैंने नईदुनिया के लिए एक लेख लिखकर अभयजी की टेबल पर रखा, जिसे उन्होंने यशवंत व्यास को सौंप दिया। यशवंत व्यास ने उस लेख का अपनी कुटिल मति से संपादन किया और उसका सत्यानाश कर दिया। लेख छपने के बाद मुझे बहुत बुरा लगा। मैं सोचने लगा कि अगर चंद्रशेखर ने लेख पढ़ लिया तो पता नहीं क्या सोचेंगे। इस बीच बंबई से राहुल देव की तरफ से सूचना आ गई थी। मुझे जल्दी बंबई पहुंचने के लिए कहा गया था। प्रभु दा ने राहुल देव के लिए एक पत्र भी लिखकर दे दिया था।अब मैं जाने से पहले यशवंत व्यास को दस बातें सुनाकर जाना चाहता था कि उसने मेरे साथ ऐसी घटिया हरकत क्यों की? अपनी संपादन कला का दुरुपयोग क्यों किया? मैंने रविवार को भूपेन्द्र चतुर्वेदी के घर पहुंचकर विस्तार से इस विषय पर बातचीत की। पटकथा तैयार की कि सोमवार को क्या करना है। मैंने यशवंत व्यास को खरी खोटी सुनाकर नईदुनिया छोड़ने का फैसला कर लिया था। 1990 में वह शायद मध्य नवंबर का कोई सोमवार था। मैंने मन ही मन नईदुनिया छोड़ने की तैयारी कर ली थी। भूपेन्द्र चतुर्वेदी को मालूम था कि क्या होने वाला है।
सुबह रोज की तरह ड्यूटी पर पहुंचा। महेन्द्र सेठिया सुबह करीब साढ़े दस बजे आ गए। अभयजी भी आ गए। वे दोपहर को भोजन करने घर चले जाते थे। एक से दो बजे के बीच हम भी कैंटीन में जाकर अपना अपना टिफन खोलते थे। नीलमेघ, भानु चौबे, भूपेन्द्र साथ में भोजन करते। महेन्द्रजी और अभयजी चले गए तब हम भी भोजन करने के बाद अपनी अपनी टेबलों पर लौट आए। यशवंत व्यास अपनी जगह पर बैठे थे। उनकी बगल में निर्मला भुराडिया बैठी थीं। खेल हलचल वाली डेस्क पर मनोहर भाटी बैठा था। डाक की डेस्क पर नीलमेघ और भानु चौबे थे। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं। तीन दिन की छुट्टी का आवेदन लिखकर मैंने जेब में रख लिया था। कार्यालय में रोज की तरह शांति थी।
करीब 2 बजे मैं प्रूफ टेबल से उठकर यशवंत व्यास के पास पहुंचा। मैंने कहा, जरूरी बात करनी है। वह मुझे देखकर ताड़ गए कि कुछ गड़बड़ है, इसलिए वह बात करने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा, बाद में बात करेंगे। लेकिन मैं उनके सामने कुर्सी पर बैठ गया। कहा, आप ये गिलास देख रहे हैं? इसमें आप चाय या पानी पीते हैं। अगर इसे थोड़ा सा तोड़ दिया जाए और उसमें आपको चाय, पानी दिया जाए तो कैसा लगेगा? चाय, पानी तो वही रहेगा, लेकिन गिलास का आकार बिगड़ जाएगा। आप इसी तरह संपादन करते हैं। यह कहते हुए मैं जोर से चिल्लाया कि आप संपादन करते हैं या घास काटते हैं? या बदले की भावना से काम करते हैं? ….. मैंने जोर जोर से कुछ बातें सुनाईं और प्रूफ टेबल पर जाकर बैठ गया। इस दौरान निर्मला भुराडिया उठकर चली गई थीं।
यशवंत व्यास ने थोड़ी बहुत बहस की होगी, लेकिन वह ज्यादातर चुपचाप मेरी बातें सुनते रहे। मेरे प्रूफ टेबल पर लौटने के बाद उन्होंने फोन करके अभयजी से शिकायत की और कार्यालय से बाहर चले गए। तीन बजे बाद अभयजी आए। उन्होंने चपरासी के हाथ एक पर्ची भिजवाई, तत्काल यहां आकर मिलें। मैं उनके सामने पहुंच गया। उन्होंने बैठने को कहा, मैं उनके सामने कुर्सी पर बैठ गया। वे थोड़ी देर चुपचाप डाक देखते रहे। फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, क्या आप मेरे सामने वे डायलाग नरेट कर सकेत हैं, जो आपने यशवंत व्यास से कहे थे? मैंने कहा, बिलकुल नरेट कर सकता हूं। उन्होंने मनोहर भाटी को बुला लिया। यह पुष्टि करने के लिए कि मैं सही बोलता हूं या गलत। मैंने जो कहा था, वह सब दोहरा दिया।
अभयजी ने मनोहर से पूछा, क्या ये सही कह रहे हैं? मनोहर ने कहा, हां, लेकिन इनकी आवाज बहुत तेज थी। पीछे डार्क रूम तक इनकी आवाज पहुंच रही थी। अभयजी ने मुझसे कहा, आपने यह तो बताया ही नहीं कि आप इतनी जोर से बोल रहे थे। मैंने कहा, मैं आपके सामने इतनी जोर से नहीं बोल सकता। चंद्रशेखरजी प्रधानमंत्री बने हैं और मैं उनके साथ काफी समय रहा, इसलिए लेख लिखा था। यशवंत व्यास ने उसे छापने से पहले बिगाड़ दिया। इसलिए गुस्सा आ रहा था। अभयजी ने मेरी बात सुनी। थोड़ी देर असुविधाजनक सन्नाटा बना रहा। फिर उन्होंने कहा, आप 10 दिन की छुट्टी की अर्जी दे दीजिए और अपनी टेबल पर लौटे बगैर सीधे दफ्तर से बाहर निकल जाइए।
मुझे मालूम था, यही होगा। मैं इतने दिनों से नईदुनिया में काम कर रहा था। अनुशासन का वहां काफी महत्व था। मैंने अनुशासन भंग किया था। अनुशासन भंग करने वाले को छुट्टी पर भेज दिया जाता था। मैंने 3 दिन की छुट्टी की जो अर्जी पहले से लिखकर जेब में रख ली थी, वह मैंने अभयजी को दे दी और उनके निर्देश के विपरीत प्रूफ टेबल पर लौटा। वहां मौजूद प्रकाश जैन मुझे सवालिया निगाहों देख रहे थे। मैंने उनसे कहा, अभयजी ने घर जाने के लिए कहा है। और, पेन उठाकर जेब में रखते हुए कार्यालय से बाहर निकल गया। गेट के पास टाइम कीपर ने आवाज देकर रोका। पूछा, भीतर कुछ गड़बड़ हो गई है क्या? मैंने कहा, हां, यशवंत व्यास के साथ मेरी कहासुनी हो गई थी। उसने कहा, अभयजी ने कहा है, आप कार्यालय लौटें तो पहले उनकी अनुमति ले लें। मैं समझ गया कि उन्होंने दस दिन की छुट्टी की अर्जी मांगी थी, मैंने तीन दिन की छुट्टी की अर्जी दी थी। उन्होंने टाइम कीपर को इसी लिए फोन किया होगा। खैर, उस अर्जी का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि मैं हमेशा के लिए नईदुनिया से बाहर निकल रहा था। अगले दिन शाम को मैं वीडियो कोच में सवार होकर बंबई के लिए रवाना हो गया।


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