(1)
रेतीले सम्बन्ध थे ,
कैसे बनते भीत ।
हल्की सी आँधी चली ,
बिखरे सारे मीत ।।
(2)
एक तरफ़ तो रेत थी ,
एक तरफ़ थे ख़ार ।
फिर दोनों के बीच थी ,
पानी की दीवार ।।
(3)
अज्ञेयी चेलो सुनो ,
अब भी जाओ चेत ।
बिना छन्द के काव्य है ,
फ़क़त भुरभुरी रेत ।।
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'


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