नई दुनिया में प्रूफ रीडिंग


ऋषिकेश राजोरिया 

नईदुनिया की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसमें प्रूफ रीडिंग का विभाग बहुत मजबूत था। कोई भी शब्द गलत नहीं छपना चाहिएइस पर पूरा जोर रहता। दूसरी बात यह कि तीन मंजिला इमारत में कहीं भी किसी भी कमरे या आलमारी में तिजोरी को छोड़कर ताला नहीं लगता था। संपादकीय विभाग का काम नीचे होता था। बीच की मंजिल पर एकाउंटेंट और प्रशासनिक विभाग के लोग बैठते थे। ऊपरी मंजिल पर लाइब्रेरी थीजो किसी विश्वविद्यालय की टक्कर की मानी जा सकती थी। पंड्याजी ने मुझे विज्ञापन विभाग से संपादकीय विभाग में भेजा तो मेरी मुराद पूरी हुई। प्रूफ रीडिंग से उप संपादक बनने से मुझे कोई नहीं रोक सकता था।

नईदुनिया में उप संपादकों की भर्ती के नियम सख्त थे। किसी अन्य अखबार में पहले काम कर चुके लोगों को नौकरी पर रखने की परंपरा वहां नहीं थी। वहां फ्रेश लोगों को पहले ट्रेनी के रूप में भर्ती किया जाता। कई महीने उनका टेस्ट चलताफिर उन्हें अखबार में काम करने का मौका मिलता। देश के कई बड़े पत्रकार कभी न कभी नईदुनिया में काम कर चुके हैं। वह पत्रकारों के लिए मात्र नौकरी करने की जगह नहीं थीबल्कि पत्रकारिता का एक जीवंत संस्थान था। अगर नईदुनिया में काम कर चुका कोई पत्रकार किसी हिंदी अखबार में नौकरी के लिए जाता तो उसे इंटरव्यू देने की जरूरत नहीं होती थीउसे सीधे नियुक्ति मिलती थी। उन दिनों आजकल की तरह बीजेएमसीएमजेएमसी की पढ़ाई नहीं होती थी। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों की शुरूआत हो चुकी थीलेकिन अखबार के दफ्तरों में उसका कोई मतलब नहीं था।

नईदुनिया में मेरी नौकरी लगने से सबको अच्छा लगा। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी। मैं पहले से संपादकीय विभाग में काम करने का अभ्यस्त थाइसलिए कठिनाई होने की गुंजाइश नहीं थी। इसी दौरान बंबई से बेनेट कोलमैन एंड कंपनी का पत्र मिलने के बाद मैं नवभारत टाइम्स के लिए लिखित परीक्षा दे आया था और चयन की पूरी उम्मीद थी। उम्मीद पूरी भी हुईलेकिन नहीं भी हुई। नईदुनिया में काम करते हुए मई को मेरी शादी हो गई। इसके बाद हम एक बड़े घर में चले गए। नवभारत टाइम्स में काम शुरू करने के लिए पत्र पुराने पते पर पहुंचा। मकान मालकिन की बेटी ने वह पत्र समय पर नहीं पहुंचाया। करीब एक महीने के बाद वह पत्र देने हमारे घर पहुंची। जॉइनिंग का समय निकल चुका था। फिर भी मैं दो तीन दिन की छुट्टी लेकर बंबई गया। नवभारत टाइम्स के संपादक विश्वनाथ सचदेव से मिला। लेकिन नियुक्तियां हो चुकी थी। मैं निराश हो कर लौट आया और नईदुनिया में काम करने लगा।

किसी भी पत्रकार के लिए काम करने की नईदुनिया से अच्छी जगह और कोई नहीं हो सकती। ऐसा अनुभव मुझे हुआ। नईदुनिया से बचपन से ही लगाव था। सुबह सबसे पहले घर में जो देखा जाता थावह होता था नईदुनिया। जब कॉलेज में पढ़ता था और एनएसएस की गतिविधियों में व्यस्त थातब इच्छा होती थी कि नईदुनिया में कुछ छपे। बातचीत के दौरान पीयूष वाजपेयी कहता था कि अखबार में लेख छपना आसान नहीं है। संपादक के नाम पत्र छपना भी मुश्किल होता है। उसकी बात मुझे चुनौती की तरह लगती और मैं रोजाना कुछ न कुछ लिखकर नईदुनिया के कार्यालय के सामने उसके लैटरबॉक्स में डाल आता था। कुछ नहीं छपता लेकिन प्रयास जारी रहता। एक बार नईदुनिया के दीपावली विशेषांक में मेरा एक व्यंग्य छप गया। राजनीति की नब्ज पान की दुकान। उसके साथ एक कार्टून भी छपा। कचरू दादा विशेषांक खोलकर पन्ने पलट रहे थेतब उन्होंने मुझे बतायाऋषिकेशतेरा लेख छपा है। वह लेख देखकर मुझे इतनी खुशी हुईजिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। बाद में लिखना पढ़ना जिंदगी बन गई। उस लेख के 15 रुपए मुझे मिले थेजो नईदुनिया की तरफ से मनी ऑर्डर से भेजे गए थे।

किस्मत से मुझे नईदुनिया में काम करने का मौका मिल गया। शुरू में सुबह 12 बजे से रात बजे तक काम करता था। नईदुनिया का संपादकीय विभाग एक बड़े हाल में था। उस हाल में सबके लिए उनके स्तर की टेबल कुर्सियां लगी थी। किसी के लिए कोई केबिन नहीं था। दरवाजे में प्रवेश करते ही दाईं तरफ अभय छजलानी की कुर्सी होती। उनकी दाईं तरफ यशवंत व्यास और निर्मला भुराडिया बैठते थे। उसकी बगल में रनवीर सक्सेनाजो संपादकीय लिखते थे। उनके सामने राहुल बारपुते की कुर्सी थीजिन्हें सब बाबा कहते थे। उनके पास एक बड़ी कुर्सी महेन्द्र सेठिया की थी। फिर समाचार डेस्कडाक की डेस्कशहर की डेस्कइस तरह टेबलें तय थीं और सबसे पीछे प्रूफ रीडर बैठते थे। प्रूफ डेस्क का काम किशोर शर्मा संभालते थे। वे अलग तरह के व्यक्ति थे।

उन दिनों नईदुनिया के तीन भागीदार माने जाते थे। छजलानी परिवारसेठिया परिवार और दिवंगत नरेन्द्र तिवारी का परिवार। पूरा संपादकीय छजलानी और सेठिया संभालते थेजबकि विज्ञापन विभाग में नरेन्द्र तिवारी के पुत्र राजेन्द्र तिवारी के बैठने की जगह होती। विज्ञापन विभाग की इमारत अलग थी। राजेन्द्र माथुर के नवभारत टाइम्स में चले जाने के बाद कोई प्रधान संपादक नहीं था। राहुल बारपुते पूर्व संपादक के रूप में बैठते थे और अखबार में जो रोजाना स्ट्रिप्स छपती थीब्लांडी और धारावाहिक कॉमिक्स मॉडेस्टी ब्लेजउसके अंग्रेजी संवादों का हिंदी में अनुवाद करते थे। कभी कभी संपादकीय भी लिखते थे। उनकी मेज के पास कम से कम दस तरह की डिक्शनरियां रखी रहती थीं। प्रूफ टेबल पर करीब दस लोग किशोर शर्मा के अधीन काम करते थेजिनमें मैं भी शामिल हो गया था।

एक दिन शनिवार दोपहर दफ्तर पहुंचने में मुझे करीब बीस मिनट की देरी हुई। राजेश वहां थाजिसे राजू कहते थे। वह सेठिया का रिश्तेदार भी था। उसने मुझसे कहालेट कैसे हो गएसोमवार से काम पर आना है या नहींउसकी बात सुनकर मुझे गुस्सा आ गया। लेकिन मैं चुप रहा और हाल में देखने लगा कि इस समय कौन सर्वोच्च अधिकारी यहां मौजूद है। बसंतीलाल सेठिया आ चुके थेवे महेन्द्र सेठिया के पिता थे। मैं सीधे उनके पास पहुंच गया। नमस्कार किया और कहामैंने हाल ही यहां प्रूफ रीडर के तौर पर काम शुरू किया हैआज आने में कुछ देर हो गईएक लड़के ने पूछा है कि मुझे सोमवार से काम पर आना है या नहींतो मैं आपसे पूछने चला आया कि सोमवार से काम पर आना है या नहीं?

सेठियाजी ने मुझे सम्मानपूर्वक बैठाकर चाय पिलाई। एक चपरासी को भेजा। वह राजू को बुलाकर ले आया। उन्होंने मुझसे पूछायही लड़का हैमैंने कहाहां। उन्होंने राजू को वापस भेज दिया और मुझसे कहाआराम से काम करोकोई कुछ नहीं कहेगा। मैं प्रूफ टेबल पर काम करने लगा। सोमवार को राजू को प्रूफ टेबल से हटा दिया गया था। महेन्द्र सेठिया इस घटना के बाद मुझ पर नाराज हुए। उन्होंने कहासीधे उनके पास जाने की क्या जरूरत थीमेरे पास आना थाअभयजी के पास चले जाते। कोई भी मामला हो तो पहले निचली अदालत में जाते हैंफिर हाईकोर्ट होती हैतुम सीधे सुप्रीम कोर्ट में चले गएमुझे उनकी बात सुनकर मामले की गंभीरता का अहसास हुआ। उसके बाद मैंने कसम खा ली कि कभी भी किसी सहकर्मी की इस तरह शिकायत नहीं करनी चाहिए।