ये मेरे मन की राजधानी है
पुण्य की कामना है पाप यहाँ
अर्थ की मोक्ष की या काम की हो
चाह भी एषणा ही होती है
लोक में रह के पारलौकिक सी
व्यर्थ हर घोषणा ही होती है
लोभ से या कि बैर से भय से
धर्म को आँकना है पाप यहाँ
रूप को पूजने की चाहत को
लोग क्यों वासना समझते हैं
भोग के कामयाब साधक ही
बस इसे साधना समझते हैं
शील की और आत्मसंयम की
डोर को थामना है पाप यहाँ
हो मिलन जब पुरुष व प्रकृति का
तो सृजन फल को अपने पाता है
ये सृजन-फल ही सृष्टि के क्रम में
शिव के सातत्व को बढ़ाता है
देह की वर्जनाओं की ख़ातिर
काम का काँपना है पाप यहाँ
पाप है पुण्य का विलोम नहीं
पाप है पुण्य का ही रूप यहाँ
भाव जो है हमारी सोच में वो
कूप है या है मन की धूप यहाँ
झूठ की आरसी निगाहों से
सत्य का सामना है पाप यहाँ
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

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