दैनिक दस्तक में नौकरी

ऋषिकेश राजोरिया 

सांध्यकालीन अखबार दैनिक दस्तक में काम ठीक चल रहा था। रोजाना आठ पेज टेब्लाइड साइज के निकलते। दोपहर दो तीन बजे अखबार छपना शुरू हो जाता। उस दौरान झाबुआ जिले के संवाददाता ने एक खबर भेजी। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडीके पांच ठेकेदारों ने 11 लाख रुपए के बिल पेश किएजिनका भुगतान फर्जी होने की शंका में कलेक्टर ने रोक दिया। वे ठेकेदार कलेक्टर का तबादला कराने के लिए मंत्री के पास पहुंचे और लाख रुपए रिश्वत देने की पेशकश की। खबर देखकर मैंने उसे सनसनीखेज तरीके से बनाया और कंपोजिंग के लिए भेज दिया।

यूनुस भाई ने अपनी मेज दफ्तर के प्रवेश द्वार पर ही लगा रखी थी। बीच बीच में उठकर कार्यप्रणाली का मुआयना करते रहते थे। उन्होंने कंपोजिटर के पास वह खबर देखी और कापी लेकर अपनी दराज में रख ली। मुझसे कहाइस खबर को और अच्छी तरह से छापेंगे। मालिक हैंकुछ भी आदेश दे सकते हैं। मैं एतराज करने वाला कौनवह खबर उस दिन नहीं छपी। अगले दिन सुबह जब मैं ड्यूटी पर पहुंचा तो मेरी मेज पर एक अन्य व्यक्ति काम कर रहा था। यूनुस भाई ने मुझे बुलाया। सम्मानपूर्वक सामने बैठाया। चाय मंगवाई और कहा कि आप तो अनुभवी पत्रकार हैं। आपकी जगह यहां नहींकिसी बड़े अखबार में ही ठीक रहेगी। हमारा तो छोटा अखबार हैजो आपके साइज का नहीं है। आप संबंध बनाए रखिए। मैं आपको दो महीने की सेलरी एडवांस में दे देता हूं। आप आज से यहां काम नहीं कर रहे हैं। आप मेरी बात का बुरा मत मानिए। मैंने चाय पीरुपए जेब में रखे और दफ्तर से बाहर निकल आया।

पंढरीनाथ चौराहे पर बद्री भैया के पास पहुंचाजो मेरे मित्र थे और पान व साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते थे। यूनुस भाई के दफ्तर से निकलने के बाद मैं हैरानी की मुद्रा में था। बद्री भैया ताड़ गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने पूछाक्या हुआमैंने पूरा घटनाक्रम बता दिया। उन्होंने माथा ठोकते हुए कहा कि यूनुस खुद पीडब्ल्यूडी का ठेकेदार है। वह इस तरह की खबर अपने अखबार में कैसे छपने देगाक्या यह बात दिमाग में नहीं आईमुझे नहीं मालूम था कि यूनुस ठेकेदार भी है। इसके बाद बद्री भैया ने सांत्वना दी कि परेशान होने की जरूरत नहीं है। ये देख नईदुनिया में एक विज्ञापन छपा है। मैंने विज्ञापन देखा। नईदुनिया के विज्ञापन विभाग में प्रूफ रीडर की जरूरत थी। मैं अगले दिन नईदुनिया में पहुंचा। विज्ञापन विभाग में पंड्याजी से मुलाकात हुई। उन्होंने पूछाकितने वेतन की इच्छा रखते होमैंने कहा पांच सौ रुपए ठीक रहेंगे। उन्होंने कहा हम छह सौ रुपए देंगे। काम शुरू कर दो। इस तरह फरवरी 1987 को नईदुनिया में प्रवेश हुआ।

उस दिन बसंत पंचमी थी। उसी दिन गायत्री के साथ मेरी सगाई हो गई। मैं शादी के बारे में सोचता भी नहीं थालेकिन परिवार के लोगों ने घेर कर मेरी शादी करने का फैसला कर लिया था। मुझसे छोटे तीन भाई और एक बहन। उनकी शादी का सिलसिला आगे बढ़ाने के लिए उन्हें पहले मेरी शादी करना जरूरी लगा। इसलिए उन्होंने मेरी सगाई कर दी थी। मैं नईदुनिया के विज्ञापन विभाग में प्रूफ रीडिंग करने लगा। मेरे साथ ही ललित उपमन्यु और एक अन्य युवक भी नईदुनिया के विज्ञापन विभाग में भर्ती हुए थे। बाद में उस युवक को कहीं सरकारी नौकरी मिल गई। ललित उपमन्यु बाद में इंदौर का बड़ा पत्रकार बना। और मैं भी बहुत ज्यादा दिन विज्ञापन विभाग में काम करने वाला नहीं था। दो महीने बाद ही संपादकीय विभाग में प्रूफ रीडिंग करने वाली दो लड़कियां परीक्षा की तैयारी के लिए काम छोड़ गई। वहां जरूरत थी तो महेन्द्र सेठिया ने पंड्याजी से कहा कि आपने जो प्रूफ रीडर भर्ती किए हैंउनमें से एक हमारे पास भेज दो। पंड्याजी ने मुझे संपादकीय विभाग में भेज दिया।