तेरा मेरा रिश्ता है अब
मजबूरी का इक सौदा
कल तक हम थे एक ज़रूरत
इक दूजे की कुछ ऐसे
होती है लम्बे पैरों की
छोटी सी चादर जैसे
दोनों थे दोनों की ख़ातिर
मन्ज़ूरी का इक सौदा
किन्तु ज़रूरत पूरी होकर
बन्धन की ज़ंजीर हुई
क्या जाने कब मुक्त फ़्रेम से
कैसे ये तस्वीर हुई
ढूँढ रहा था तब से मन-मृग
कस्तूरी का इक सौदा
आख़िर भाँप लिया दोनों ने
इस रिश्ते का नकलीपन
कब तक तन को धोखा देता
ये अपना उकताया मन
कितना भारी बन बैठा था
मग़रूरी का इक सौदा
अब तो एक दिखावा ही है
इस रिश्ते की बाहों में
अब दोनों ही सुलझ रहे हैं
और किसी की चाहों में
तोल रहे हैं बहुत निकट से
हर दूरी का इक सौदा
©️✍️ लोकेश कुमार सिंह 'साहिल'

0 टिप्पणियाँ